Skip to content
SarvaKosh
संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished770 pages

Page 616 of 770

Read in context
Page 616

६१४ * संक्षिप्त नारदपुराण *

मुझ कुमारीके साथ आप विवाह कर लें।

तब राजा रुक्माङ्गदने मन्दराचलपर उस चपलनयना मोहिनीके साथ विधिपूर्वक विवाह किया और उसके साथ हँसते हुए-से रहने लगे।

राजाने कहा—वरानने! स्वर्गकी प्राप्ति भी मुझे वैसा सुख नहीं दे सकती, जैसा सुख इस मन्दराचल पर्वतपर तुम्हारे मिलनेसे प्राप्त हो रहा है। बाले! तुम यहीं मेरे साथ रहोगी या मेरे राजमहलमें?

राजा रुक्माङ्गदकी बात सुनकर मोहिनीने अनुरागपूर्वक मधुर वाणीमें कहा—'राजन्! जहाँ आपको सुख मिले, वहीं मैं भी रहूँगी। स्वामीका निवासस्थान धन-वैभवसे रहित हो तो भी पत्नीको वहीं निवास करना चाहिये। उसके लिये पतिके सामीप्यको ही सुवर्णमय मेरु पर्वत बताया गया है। नारीके लिये पतिके निवासस्थानको छोड़कर अपने पिताके घर भी रहना वर्जित है। पिताके स्थान और आश्रयमें आसक्त होनेवाली स्त्री नरकमें डूबती है। वह सब धर्मसे रहित होकर सूकर-योनिमें जन्म लेती है*। इस प्रकार पतिके निवासस्थानसे अन्यत्र रहनेमें जो दोष है, उसे मैं जानती हूँ। अतः मैं आपके साथ ही चलूँगी। सुखमें और दुःखमें आप ही मेरे स्वामी हैं।'

मोहिनीका यह कथन सुनकर राजाका हृदय प्रसन्नतासे खिल उठा। वे उस सुन्दरीको हृदयसे लगाकर बोले—'प्रिये! मेरी समस्त पत्नियोंमें तुम्हारा स्थान सर्वोपरि होगा। मेरे घरमें तुम प्राणोंसे भी अधिक प्रिय बनकर रहोगी। आओ, अब हम लोग सुखपूर्वक राजधानीकी ओर चलें।' राजा रुक्माङ्गदने जब ऐसी बात कही, तब चन्द्रमाके समान मुखवाली मोहिनी उस पर्वतकी शोभाको अपने साथ खींचती हुई (राजा रुक्माङ्गदके साथ राजधानीकी ओर) चली।

घोड़ेकी टापसे कुचली हुई छिपकलीकी राजाद्वारा सेवा, छिपकलीकी आत्मकथा, पतिपर वशीकरणका दुष्परिणाम, राजाके पुण्यदानसे उसका उद्धार

**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजन्! वे दोनों पति-पत्नी मन्दराचलके शिखरसे पृथ्वीकी ओर प्रस्थित हुए। मार्गमें अनेकों मनोहर पर्वतीय दृश्योंको देखते हुए क्रमशः नीचे उतरने लगे। पृथ्वीपर आकर राजाने अपने श्रेष्ठ घोड़ेको देखा, जो वज्रके समान कठोर टापोंसे धरतीको वेगपूर्वक खोद रहा था। उस भूभागके भीतर एक छिपकली रहती थी। जब तीखी टापसे वह घोड़ा धरती खोद रहा था, उसी समय वह छिपकली वहाँसे निकलकर जाने लगी। इतनेमें ही टापके आघातसे उसका शरीर विदीर्ण हो गया। दयालु राजा रुक्माङ्गदने जब उसकी यह दशा देखी तो वे बड़े वेगसे दौड़े और वृक्षके कोमल पत्तेसे उन्होंने स्वयं उसे खुरके नीचेसे उठाया तथा घास एवं तृणसे भरी हुई भूमिपर रख दिया। तत्पश्चात् उसे मूर्च्छित देख मोहिनीसे बोले—'सुन्दरी! शीघ्र पानी ले आओ। कमललोचने! यह छिपकली कुचलकर मूर्च्छित हो गयी है। इसे उस जलसे सींचूँगा।' स्वामीकी आज्ञासे मोहिनी शीघ्र शीतल जल ले आयी। राजाने उस जलसे बेहोश पड़ी हुई छिपकलीको सींचा। राजन्! शीतल जलके अभिषेकसे उसकी खोयी हुई चेतना फिर लौट


*भर्तृस्थानं परित्यज्य स्वपितुर्वापि वर्जितम्॥
पितृस्थानाश्रयरता नारी तमसि मज्जति। सर्वधर्मविहीनापि नारी भवति सूकरी॥
(ना० उत्तर० १३। १८-१९)