संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context| * पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४९५ |
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आदिमें भी पूजा कर सकते हैं। पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर मूलमन्त्रसे मूर्तिनिर्माण करके उसमें भगवान्का आवाहन और प्रतिष्ठा करे। तत्पश्चात् पहले गुरुदेवकी पूजा करके भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा करे। भगवान्के पार्श्वभागमें रुक्मिणी और सत्यभामाका, सामने इन्द्रका तथा पृष्ठभागमें सुरभिदेवीका पूजन करके केसरोंमें अङ्गपूजा करे। फिर आठ दलोंमें कालिन्दी आदि आठ पटरानियोंकी पूजा करके पीठके कोणोंमें किङ्किणी और दाम* (रस्सी) की अर्चना करे। पृष्ठभागोंमें वेणुकी तथा सम्मुख श्रीवत्स एवं कौस्तुभकी पूजा करे। आगेकी ओर वनमाला आदि अलंकारोंका पूजन करे। आठ दिशाओंमें स्थित पाञ्चजन्य, गदा, चक्र, वसुदेव, देवकी, नन्दगोप, यशोदा तथा गौओं और ग्वालोंसहित गोपिका—इन सबकी पूजा करे। उनके बाह्यभागमें इन्द्र आदि दिक्पाल तथा उनके भी बाह्यभागमें वज्र आदि आयुध हैं। फिर पूर्व आदि दिशाओंमें क्रमशः कुमुद, कुमुदाक्ष, पुण्डरीक, वामन, शंकुकर्ण, सर्वनेत्र, सुमुख तथा सुप्रतिष्ठित—इन दिग्गजोंका पूजन करके विष्वक्सेन तथा आत्माका पूजन करना चाहिये। जो मनुष्य एक या तीनों समय श्रीगोविन्दका पूजन करता है, वह चिरायु, निर्भय तथा धन-धान्यका स्वामी होता है।
सद्य (ओ) सहित स्मृति (ग्) अर्थात् 'गो', दक्षिण कर्ण (उ) युक्त चक्री (क्) अर्थात् 'कु', धरा (ल)—इन अक्षरोंके पश्चात् 'नाथाय' पद और अन्तमें हृदय (नमः) यह—'गोकुलनाथाय नमः' महामन्त्र आठ अक्षरोंका है। इसके ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द तथा श्रीकृष्ण देवता हैं। इसके दो-दो अक्षरों तथा सम्पूर्ण मन्त्रसे पञ्चाङ्गन्यास करे।
ध्यान
पञ्चवर्षमतिलोलमङ्गने
धावमानमतिचञ्चलेक्षणम् ।
किङ्किणीबलयहारनूपुरै
रञ्चितं नमत गोपबालकम्॥ ८०॥
'बाल गोपालकी पाँच वर्षकी अवस्था है, वे अत्यन्त चपल गतिसे आँगनमें दौड़ रहे हैं, उनके नेत्र भी बड़े चञ्चल हैं, किङ्किणी, वलय, हार और नूपुर आदि आभूषण विभिन्न अङ्गोंकी शोभा बढ़ा रहे हैं, ऐसे सुन्दर गोपबालकको नमस्कार करो।'
इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रोपासक आठ लाख जप और पलाशकी समिधाओं अथवा खीरसे दशांश हवन करे। पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर मूलमन्त्रसे मूर्तिका संकल्प करके उसमें मन्त्रसाधक स्थिरचित्त हो भगवान् श्रीकृष्णका आवाहन और पूजन करे। चारों दिशा-
* यशोदा मैयाने रस्सीसे उन्हें बाँधा था, इसीसे कमरमें किंकिणीके साथ दाम (रस्सी)-की पूजाका विधान है।