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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 496 of 770

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Page 496

४९४ * संक्षिप्त नारदपुराण *


‘जो कपिला गायोंके बीचमें खड़े हो उनको पुकारते हैं, बायें हाथमें मुरली और दायें हाथमें रस्सी और लाठी लिये हुए हैं, जिनकी अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम है, जो पीतवस्त्र और मोर-पंखका मुकुट धारण करते हैं, उन श्यामसुन्दर श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये।’

ध्यानके बाद, सात लाख मन्त्र-जप और गोदुग्धसे दशांश हवन करे। पूर्वोक्त वैष्णवपीठपर पूजन करे। अङ्गोंद्वारा प्रथम आवरण होता है। द्वितीय आवरणमें—सुवर्ण-पिङ्गला, गौर-पिङ्गला, रक्त-पिङ्गला, गुड-पिङ्गला, वभ्रु-वर्णा, उत्तमा कपिला, चतुष्क-पिङ्गला तथा शुभ एवं उत्तम पीत-पिङ्गला—इन आठ गायोंके समुदायकी पूजा करके तीसरे और चौथे आवरणोंमें इन्द्रादि लोकेशों तथा वज्र आदि आयुधोंका पूजन करे।

इस प्रकार पूजन करके मन्त्र सिद्ध कर लेनेपर मन्त्रज्ञ पुरुष उसके द्वारा कामना-पूर्तिके लिये प्रयोग करे। जो प्रतिदिन गोदुग्धसे एक सौ आठ आहुति देता है, वह पंद्रह दिनमें ही गोसमुदायसहित मुक्त हो जाता है। दशाक्षर मन्त्रमें भी यह विधि है। 'ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय' यह द्वादशाक्षर मन्त्र कहा गया है। इसके नारद ऋषि माने गये हैं। छन्द गायत्री है और गोविन्द देवता कहे गये हैं। एक, दो, चार और पाँच अक्षरों तथा सम्पूर्ण मन्त्रसे पञ्चाङ्ग-न्यास करे।

ध्यान

ध्यायेत् कल्पद्रुमूला श्रितमणिविलसद्दिव्यसिंहासनस्थं
मेघश्यामं पिशङ्गांशुकमतिसुभगं शङ्खवेत्रे कराभ्याम्।
बिभ्राणं गोसहस्रैर्वृतममरपतिं प्रौढहस्तैककुम्भ-
प्रश्योतत्क्षीरधारास्नपितमभिनवाम्भोजपत्राभनेत्रम् ॥

‘दिव्य कल्पवृक्षके नीचे मूलभागके समीप नाना प्रकारकी मणियोंसे सुशोभित दिव्य सिंहासनपर भगवान् श्रीकृष्ण विराज रहे हैं। उनकी अङ्गकान्ति मेघके समान श्याम है, वे पीताम्बर धारण किये अत्यन्त सुन्दर लग रहे हैं। अपने दोनों हाथोंमें शङ्ख और बेंत ले रखे हैं। सहस्रों गायें उन्हें घेरकर खड़ी हैं। वे सम्पूर्ण देवताओंके प्रतिपालक हैं। एक प्रौढ़ व्यक्तिके हाथोंमें एक कलश है, उससे अमृतकी धारा झर रही है और उसीसे भगवान् स्नान कर रहे हैं; उनके नेत्र नूतन विकसित कमल-दलके समान विशाल एवं सुन्दर हैं। ऐसे श्रीहरिका ध्यान करना चाहिये।

तत्पश्चात् बारह लाख मन्त्र जपे। फिर गोदुग्धसे दशांश होम करके पूर्ववत् गोशालामें स्थित भगवान्‌का पूजन करे। अथवा प्रतिमा