संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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विदिशाओंमें जो केसर हैं, उनमें अङ्गोंकी पूजा करे। फिर दिशाओंमें वासुदेव, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका तथा कोणोंमें रुक्मिणी, सत्यभामा, लक्ष्मणा और जाम्बवतीका पूजन करे। इनके बाह्यभागोंमें लोकेशों और आयुधोंकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे मन्त्र सिद्ध हो जाता है।
तार (ॐ), श्री (श्रीं), भुवना (ह्रीं), काम (क्लीं), ङे विभक्त्यन्त श्रीकृष्ण शब्द अर्थात् 'श्रीकृष्णाय' ऐसा ही गोविन्द पद (गोविन्दाय), फिर 'गोपीजनवल्लभाय' तत्पश्चात् तीन पद्मा (श्रीं श्रीं श्रीं)—यह (ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय श्रीं श्रीं श्रीं) तेईस अक्षरोंका मन्त्र है। इसके ऋषि आदि भी पूर्वोक्त ही हैं। सिद्ध गोपालका स्मरण करना चाहिये।
ध्यान
माधवीमण्डपासीनौ गरुडेनाभिपालितौ।
दिव्यक्रीडासु निरतौ रामकृष्णौ स्मरञ्जपेत्॥ ८७॥
जो माधवीलतामय मण्डपमें बैठकर दिव्य क्रीडाओंमें तत्पर हैं, श्रीगरुडजी जिनकी रक्षा कर रहे हैं, उन श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णका चिन्तन करते हुए मन्त्र-जप करना चाहिये।
श्रेष्ठ वैष्णवोंको पूर्ववत् पूजन करना चाहिये। चक्री (क् ) आठवें स्वर (ऋ)-से युक्त हो और उसके साथ विसर्ग भी हो तो 'कृः' यह एकाक्षर मन्त्र होता है। 'कृष्ण' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है। इसके आदिमें क्लीं जोड़नेपर 'क्लीं कृष्ण' यह तीन अक्षरोंका मन्त्र बनता है। वही ङे विभक्त्यन्त होनेपर चार अक्षरोंका 'क्लीं कृष्णाय' मन्त्र होता है। 'कृष्णाय नमः' यह पञ्चाक्षर-मन्त्र है। 'क्लीं' सम्पुटित कृष्ण पद भी अपर पञ्चाक्षर-मन्त्र है; यथा—क्लीं कृष्णाय क्लीं। 'गोपालाय स्वाहा' यह षडक्षर-मन्त्र कहा गया है। 'क्लीं कृष्णाय स्वाहा' यह भी दूसरा षडक्षर-मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय' यह सप्ताक्षर-मन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। 'श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय क्लीं' यह दूसरा सप्ताक्षर-मन्त्र है। 'कृष्णाय गोविन्दाय नमः' यह दूसरा नवाक्षर-मन्त्र है। 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं' यह भी इतर नवाक्षर-मन्त्र है। 'क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलाङ्गाय नमः' यह दशाक्षर सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। 'बालवपुषे कृष्णाय स्वाहा' यह दूसरा दशाक्षर मन्त्र है। तदनन्तर गोपीजनमनोहर श्रीकृष्णका इस प्रकार ध्यान करे—
श्रीवृन्दाविपिनप्रतोलिषु नमत्संफुल्लवल्लीतति-
ष्पन्तर्जालविघट्टनैः सुरभिणा वातेन संसेविते।
कालिन्दीपुलिने विहारिणमथो राधैकजीवातु कं
वन्दे नन्दकिशोरमिन्दुवदनं स्निग्धाम्बुदाडम्बरम्॥
(ना० पूर्व० ८१। ९६)