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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 495 of 770

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Page 495
  • पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४९३
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अभीष्टकी सिद्धि कर सकता है।

'लीलादण्ड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन् विष्णो स्वाहा' यह उन्तीस अक्षरोंका मन्त्र है। इसके नारद ऋषि, अनुष्टुप् छन्द और 'लीलादण्ड हरि' देवता कहे गये हैं। चौदह, चार, चार, तीन तथा चार मन्त्राक्षरोंद्वारा क्रमशः पञ्चाङ्ग-न्यास करे।

ध्यान
सम्मोहयंश्च निजवामकरस्थलीला-
दण्डेन गोपयुवतीः परसुन्दरीश्च।
दिश्यान्निजप्रियसखांसगदक्षहस्तो
देवः श्रियं निहतकंस उरुक्रमो नः॥
(ना० पूर्व० ८१। ५५)

'जो अपने बायें हाथमें लिये हुए लीलादण्डसे भाँति-भाँतिके खेल दिखाकर परम सुन्दरी गोपाङ्गनाओंका मन मोहे लेते हैं, जिनका दाहिना हाथ अपने प्रिय सखाके कंधेपर है, वे कंसविनाशक महापराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण हमें लक्ष्मी प्रदान करें।'


इस प्रकार ध्यान करके एक लाख जप और घी, चीनी तथा मधुमें सने हुए तिल और चावलोंसे दशांश होम करे। तत्पश्चात् पूर्वोक्त पीठपर अङ्ग, दिक्पाल तथा आयुधोंसहित श्रीहरिका पूजन करे। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक 'लीलादण्ड हरि' की आराधना करता है, वह सम्पूर्ण लोकोंद्वारा पूजित होता है और उसके घरमें लक्ष्मीका स्थिर निवास होता है। सद्य (ओ)-पर स्थित स्मृति (ग्) अर्थात् 'गो', केशव (अ) युक्त तोय (व्) अर्थात् 'व', धरायुग (ल्ल), 'भाय', अग्निवल्लभा (स्वाहा)—यह (गोवल्लभाय स्वाहा) मन्त्र सात अक्षरोंका है और सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है। इसके नारद ऋषि, उष्णिक् छन्द तथा गोवल्लभ श्रीकृष्ण देवता हैं। पूर्ववत् चक्र-मन्त्रोंद्वारा पञ्चाङ्ग-न्यास करे।

ध्यान
ध्येयो हरिः स कपिलागणमध्यसंस्थ-
स्ता आह्वयन् दधददक्षिणदोःस्थवेणुम्।
पाशं सयष्टिमपरत्र पयोदनीलः
पीताम्बरोऽहिरिपुपिच्छकृतावतंसः ॥
(ना० पूर्व० ८१। ६०)