संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
DevanagariHindipublished770 pages
Page 473 of 770
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- पूर्वभाग-तृतीय पाद * | ४७१
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सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला कहा गया है।<br>सन्धिमें तीन प्रकारके आटेका दीप देना उचित है, लक्ष्मीप्राप्तिके लिये कस्तूरीका दीप विहित है, कन्याप्राप्तिके लिये इलायची, लौंग, कपूर और कस्तूरीका दीपक बताया गया है। सख्य सम्पादन करनेके लिये भी इन्हीं वस्तुओंका दीप देना चाहिये। इन सब वस्तुओंके न मिलनेपर पञ्चधान्य श्रेष्ठ माना गया है। आठ मुट्ठीका एक किञ्चित् होता है, आठ किञ्चित्का एक पुष्कल होता है। चार पुष्कलका एक आढक बताया गया है, चार आढकका द्रोण और चार द्रोणकी खारी होती है। चार खारीको प्रस्थ कहते हैं अथवा यहाँ दूसरे प्रकारसे मान बताया जाता है। दो पलका एक प्रसृत होता है, दो प्रसृतका कुडव माना गया है, चार कुडवका एक प्रस्थ और चार प्रस्थका आढक होता है। चार आढकका द्रोण और चार द्रोणकी खारी होती है। इस क्रमसे षट्कर्मोपयोगी पात्रमें ये मान समझने चाहिये। पाँच, सात तथा नौ—ये क्रमशः दीपकके प्रमाण हैं, सुगन्धित तेलसे जलनेवाले दीपकका कोई मान नहीं है। उसका मान अपनी रुचिके अनुसार ही माना गया है। तैलोंके नित्य पात्रमें केवल बत्तीका विशेष नियम होता है। सोमवारको धान्य लेकर उसे जलमें डुबोकर रखे। फिर प्रमाणके अनुसार कुमारी कन्याके हाथसे उसको पिसाना चाहिये। पीसे हुएको शुद्ध पात्रमें रखकर नदीके जलसे उसकी पिण्डी बनानी चाहिये। उसीसे शुद्ध एवं एकाग्रचित्त होकर दीपपात्र बनावे। जिस समय दीपक जलाया जाता हो, हनुमत्कवचका पाठ करे। मङ्गलवारको शुद्ध भूमिपर रखकर दीपदान करे। कूट बीज ग्यारह बताये गये हैं, अतः उतने ही तन्तु ग्राह्य हैं। पात्रके लिये कोई नियम नहीं है। मार्गमें जो दीपक जलाये जाते हैं, उनकी बत्तीमें इक्कीस तन्तु होने चाहिये। हनुमान्जीके दीपदानमें लाल सूत ग्राह्य बताया गया है। | कूटकी जितनी संख्या हो उतना ही पल तेल दीपकमें डालना चाहिये। गुरुकार्यमें ग्यारह पलसे लाभ होता है। नित्यकर्ममें पाँच पल तेल आवश्यक बताया गया है। अथवा अपने मनकी जैसी रुचि हो उतना ही तेलका मान रखे। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंके अवसरपर हनुमान्जीकी प्रतिमाके समीप अथवा शिवमन्दिरमें दीपदान कराना चाहिये।<br>हनुमान्जीके दीपदानमें जो कोई विशेष बात है उसे मैं यहाँ बता रहा हूँ। देव-प्रतिमाके आगे, प्रमोदके अवसरपर, ग्रहोंके निमित्त, भूतोंके निमित्त, गृहोंमें और चौराहोंपर—इन छः स्थलोंमें दीप दिलाना चाहिये। स्फटिकमय शिवलिङ्गके समीप, शालग्रामशिलाके निकट हनुमान्जीके लिये किया हुआ दीपदान नाना प्रकारके भोग और लक्ष्मीकी प्राप्तिका हेतु कहा गया है। विघ्न तथा महान् संकटोंका नाश करनेके लिये गणेशजीके निकट हनुमान्जीके उद्देश्यसे दीपदान करे। भयंकर विष तथा व्याधिका भय उपस्थित होनेपर हनुमद्विग्रहके समीप दीपदानका विधान है। व्याधिनाशके लिये तथा दुष्ट ग्रहोंकी दृष्टिसे रक्षाके लिये चौराहेपर दीप देना चाहिये। बन्धनसे छूटनेके लिये राजद्वारपर अथवा कारागारके समीप दीप देना उचित है। सम्पूर्ण कार्योंकी सिद्धिके लिये पीपल और बड़के मूलभागमें दीप देना चाहिये। भयनिवारण और विवाद-शान्तिके लिये, गृहसंकट और युद्ध-संकटकी निवृत्तिके लिये तथा विष, व्याधि और ज्वरको उतारनेके लिये, भूतग्रहका निवारण करने, कृत्यासे छुटकारा पाने तथा कटे हुएको जोड़नेके लिये, दुर्गम एवं भारी वनमें व्याघ्र, हाथी तथा सम्पूर्ण जीवोंके आक्रमणसे बचनेके लिये, सदाके लिये बन्धनसे छूटनेके लिये, पथिकके आगमनमें, आने-जानेके मार्गमें तथा राजद्वारपर हनुमान्जीके लिये दीपदान आवश्यक बताया गया है। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड—तीन प्रकारका मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नौ—इन्हें लघुमान कहा गया