संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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यह एक मन्त्र है। इसके ईश्वर ऋषि, अनुष्टुप् छन्द, शृङ्खलामोचक पवनपुत्र श्रीमान् हनुमान् देवता, हं बीज और स्वाहा शक्ति है। बन्धनसे छूटनेके लिये इसका विनियोग किया जाता है। छः दीर्घ स्वर तथा रेफयुक्त बीजमन्त्रसे षडङ्ग-न्यास करे (यथा—हां हृदयाय नमः, ह्रीं शिरसे स्वाहा इत्यादि)।
ध्यान
वामे शैलं वैरिभिदं विशुद्धं टङ्कमन्यतः।
दधानं स्वर्णवर्णं च ध्यायेत् कुण्डलिनं हरिम्॥
(७४। १६९-१७०)
‘बायें हाथमें वैरीयोंको विदीर्ण करनेवाला पर्वत तथा दायें हाथमें विशुद्ध टंक धारण करनेवाले, सुवर्णके समान कान्तिमान्, कुण्डल-मण्डित वानरराज हनुमान्जीका ध्यान करे।’
इस प्रकार ध्यान करके एक लाख मन्त्रका जप तथा आम्र-पल्लवसे दशांश हवन करे। विद्वानोंने इसके पूजन आदिकी विधि पूर्ववत् बतायी है। महान् कारागारमें पड़ा हुआ मनुष्य दस हजार जप करे। इससे वह कारागारसे मुक्त हो अवश्य सुखका भागी होता है।
अब मैं बन्धनसे छुड़ानेवाले शुभ हनुमन्-मन्त्रका वर्णन करता हूँ। अष्टदल कमलके भीतर षट्कोण बनावे। उसकी कर्णिकामें साध्य पुरुषका नाम लिखे। छः कोणोंमें ‘ॐ आञ्जनेयाय’ का उल्लेख करे। आठों दलोंमें ‘ॐ वातु-वातु’ लिखे। गोरोचन और कुंकुमसे यह उत्तम मन्त्र लिखकर मस्तकपर धारण करके बन्धनसे छूटनेके लिये उक्त मन्त्रका दस हजार जप करे। इस मन्त्रको प्रतिदिन मिट्टीपर लिखकर मन्त्रज्ञ पुरुष दाहिने हाथसे मिटावे। बारह बार लिखने और मिटानेसे मन्त्राराधक महान् कारागारसे छुटकारा पा जाता है। गगन (ह) नेत्र (इ)-युक्त ज्वलन (र) अर्थात् ‘हरि’ पदके पश्चात् दो बार ‘मर्कट’ शब्द बोलकर शेष (आ)-सहित तोय (व) अर्थात् ‘वा’ का उच्चारण करके ‘मकरे’ पद बोले। फिर ‘परिमुञ्चति मुञ्चति शृङ्खलिकाम्’ का उच्चारण करे। (पूरा मन्त्र इस प्रकार है—हरि मर्कट मर्कट वाम करे परिमुञ्चति मुञ्चति शृङ्खलिकाम्) यह चौबीस अक्षरोंका मन्त्र है। विद्वान् पुरुष इस मन्त्रको दायें हाथमें बायें हाथसे लिखकर मिटा दे और एक सौ आठ बार इसका जप करे। ऐसा करनेपर कैदमें पड़ा हुआ मनुष्य तीन सप्ताहमें छूट जाता है। इसमें संशय नहीं है। इसके ऋषि आदि पूर्ववत् हैं। पूजन आदि कार्य भी पूर्ववत् करे। इसका एक लाख जप और शुभ द्रव्योंसे दशांश हवन करना चाहिये। मन्त्रसाधक पुरुष इस प्रकार कपीश्वर वायुपुत्र हनुमान्जीकी आराधना करता है, वह उन सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ हैं। अञ्जनीनन्दन हनुमान्जीकी उपासना की जाय तो वे धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, अतुल सौभाग्य, यश, मेधा, विद्या, प्रभा, राज्य तथा विवादमें विजय प्रदान करते हैं। सिद्धि तथा विजय देते हैं।
सनत्कुमारजी कहते हैं—अब मैं हनुमान्जीके लिये रहस्यसहित दीपदान-विधिका वर्णन करता हूँ। जिसको जान लेनेमात्रसे साधक सिद्ध हो जाता है। दीपपात्रका प्रमाण, तैलका मान, द्रव्य-प्रमाण तथा तन्तु (बत्ती)-का मान—इन सबका क्रमशः वर्णन किया जायगा। स्थानभेद-मन्त्र, पृथक्-पृथक् दीपदान-मन्त्र आदिका भी वर्णन होगा। पुष्पसे वासित तैलके द्वारा दिया हुआ दीपक सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला माना गया है। किसी पथिकके आनेपर उसकी सेवाके लिये तिलका तैल अर्पण किया जाय तो वह लक्ष्मीप्राप्तिका कारण होता है। सरसोंका तेल रोग नाश करनेवाला है, ऐसा कर्मकुशल विद्वानोंका कथन है। गेहूँ, तिल, उड़द, मूँग और चावल—ये पञ्चधान्य कहे गये हैं। हनुमान्जीके लिये सदा इनका दीप देना चाहिये। पञ्चधान्यका आटा बहुत सुन्दर होता है। वह दीपदानमें सदा