संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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* संक्षिप्त नारदपुराण *
है। दीपदानके समय दूध, दही, माखन अथवा गोबरसे हनुमान्जीकी प्रतिमा बनानेका विधान किया गया है। सिंहके समान पराक्रमी वीरवर हनुमान्जीको दक्षिणाभिमुख करके उनके पैरको रीछपर रखा हुआ दिखावे। उनका मस्तक किरीटसे सुशोभित होना चाहिये। सुन्दर वस्त्र, पीठ अथवा दीवारपर हनुमान्जीकी प्रतिमा अङ्कित करनी चाहिये। कूटादिमें तथा नित्य दीपमें द्वादशाक्षर-मन्त्रका प्रयोग करना चाहिये।
गोबरसे लिपी हुई भूमिपर एकाग्रचित्त हो षट्कोण अङ्कित करे। उसके बाह्यभागमें अष्टदल कमल बनावे तथा उसके भी बाह्यभागमें भूपूर-रेखा खींचे। उस कमलमें दीपक रखे। शैव अथवा वैष्णव पीठकर अञ्जनीनन्दन हनुमान्जीकी पूजा करे। छः कोणोंके अन्तरालमें 'हौं हस्रें ख्ख्रें हस्त्रौं हस्ख्ख्रें हसौं,' इन छः कूटोंका उल्लेख करे। छहों कोणोंमें बीजसहित छः अङ्गोंको लिखे। मध्यमें सौम्यका उल्लेख करे और उसीमें पवननन्दन हनुमान्जीकी पूजा करके छः कोणोंमें छः अङ्गों तथा छः नामोंकी पहले बताये अनुसार पूजा करे। कमलके अष्टदलोंमें क्रमशः इन वानरोंकी पूजा करनी चाहिये—'सुग्रीवाय नमः, अङ्गदाय नमः, सुषेणाय नमः, नलाय नमः, नीलाय नमः, जाम्बवते नमः, प्रहस्ताय नमः, सुवेषाय नमः।' तत्पश्चात् षडङ्ग देवताओंका पूजन करे। 'अञ्जनापुत्राय नमः, रुद्रमूर्तये नमः, वायुसुताय नमः, जानकीजीवनाय नमः, रामदूताय नमः, ब्रह्मास्त्रनिवारणाय नमः।' पञ्चोपचार (गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य)-से इन सबका पूजन करके कुश और जल हाथमें लेकर देश-कालके उच्चारणपूर्वक दीपदानका संकल्प करे। उसके बाद दीप-मन्त्र बोले। श्रेष्ठ साधक उत्तराभिमुख हो उस मन्त्रको कूट संख्याके बराबर (छः बार) जप कर हाथमें लिये हुए जलको भूमिपर गिरा दे। तदनन्तर दोनों हाथ जोड़कर यथाशक्ति मन्त्र-जप करे। फिर इस प्रकार कहे—'हनुमान्जी! उत्तराभिमुख अर्पित किये हुए इस श्रेष्ठ दीपकसे प्रसन्न होकर आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हो जायँ।'
इस प्रकार ये तेरह द्रव्य उपयुक्त होते हैं—गोबर, मिट्टी, मषी, आलता, सिंदूर, लाल चन्दन, श्वेत चन्दन, मधु, कस्तूरी, दही, दूध, मक्खन और घी। गोबर दो प्रकारके बताये गये हैं—गायका और भैंसका। खोये हुए द्रव्यकी पुनः प्राप्तिके लिये दीपदान करना हो तो उसमें भैंसके गोबरका उपयोग आवश्यक माना गया है। मुने! दूर देशमें गये हुए पथिकके आगमन, महादुर्गकी रक्षा, बालक आदिकी रक्षा, चोर आदिके भयका नाश आदि कार्योंमें गायका गोबर उत्तम कहा गया है। वह भी भूमिपर पड़ा हो तो नहीं लेना चाहिये। जब गाय गोबर कर रही हो तो किसी पात्रमें आकाशमेंसे ही उसे रोक लेना चाहिये।
मिट्टी चार प्रकारकी कही गयी है—सफेद, पीली, लाल और काली। उनमें गोपीचन्दन, हरिताल, गेरू आदि ग्राह्य हैं; अन्य सब द्रव्य प्रसिद्ध एवं सबके लिये सुपरिचित हैं। विद्वान् पुरुष गोपीचन्दनसे चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यभागमें भैंसके गोबरसे हनुमान्जीकी मूर्ति बनावे। मन्त्रोपासक एकाग्रचित्त हो बीज और क्रोध (हं)-से उनकी पूँछ अङ्कित करे। तेलसे मूर्तिको नहलाये और गुडसे तिलक करे। कमलके समान रंगवाला धूप, जो शालवृक्षकी गोंदसे बना हो, निवेदन करे। पाँच बत्तियोंके साथ तेलका दीपक जलाकर अर्पण करे। इसके बाद (हाथ धोकर) श्रेष्ठ साधक दही-भातका नैवेद्य निवेदन करे। उस समय वह तीन बार शेष (आ)-सहित विष (म्)-का उच्चारण करे*। ऐसा करनेपर खोयी हुई भैंसों, गौओं तथा दास-दासियोंकी भी प्राप्ति हो जाती है। चोर आदि दुष्ट जीवों तथा सर्प आदिका भय प्राप्त होनेपर 'ताल' से चार दरवाजेका सुन्दर गृह बनावे। पूर्वके
* 'मा मा मा' इस प्रकार उच्चारण करना चाहिये।