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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 28 of 770

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Page 28

२६ * संक्षिप्त नारदपुराण *


ब्रह्मा है। ये ब्रह्माजी जिनके नाभिकमलसे उत्पन्न
हुए हैं, वे ही आनन्दस्वरूप परमात्मा विष्णु इस
जगत्का पालन करते हैं। उनसे बढ़कर दूसरा
कोई नहीं है। वे सम्पूर्ण जगत्के अन्तर्यामी
आत्मा हैं। समस्त संसारमें वे ही व्याप्त हो रहे
हैं। वे सबके साक्षी तथा निरञ्जन हैं। वे ही भिन्न
और अभिन्न रूपमें स्थित परमेश्वर हैं। उन्हींकी
शक्ति महामाया है, जो जगत्की सत्ताका विश्वास
धारण कराती है। विश्वकी उत्पत्तिका आदिकारण
होनेसे विद्वान् पुरुष उसे प्रकृति कहते हैं।
आदिसृष्टिके समय लोकरचनाके लिये उद्यत हुए
भगवान् महाविष्णुके प्रकृति, पुरुष और काल—
ये तीन रूप प्रकट होते हैं। शुद्ध अन्तःकरणवाले
ब्रह्मरूपसे जिसका साक्षात्कार करते हैं, जो
विशुद्ध परम धाम कहलाता है, वही विष्णुका
परम पद है। इसी प्रकार वे शुद्ध, अक्षर, अनन्त
परमेश्वर ही कालरूपमें स्थित हैं। वे ही सत्त्व,
रज, तम-रूप तीनों गुणोंमें विराज रहे हैं तथा
गुणोंके आधार भी वे ही हैं। वे सर्वव्यापी
परमात्मा ही इस जगत्के आदि-स्रष्टा हैं। जगद्गुरु
पुरुषोत्तमके समीप स्थित हुई प्रकृति जब क्षोभ
(चञ्चलता)-को प्राप्त हुई, तो उससे महत्तत्त्वका
प्रादुर्भाव हुआ; जिसे समष्टि-बुद्धि भी कहते हैं।
फिर उस महत्तत्त्वसे अहंकार उत्पन्न हुआ।
अहंकारसे सूक्ष्म तन्मात्राएँ और एकादश इन्द्रियाँ
प्रकट हुईं। तत्पश्चात् तन्मात्राओंसे पञ्च महाभूत
प्रकट हुए, जो इस स्थूल जगत्के कारण हैं।
नारदजी ! उन भूतोंके नाम हैं—आकाश, वायु,
अग्नि, जल और पृथ्वी। ये क्रमशः एक-एकके
कारण होते हैं।

तदनन्तर संसारकी सृष्टि करनेवाले भगवान्
ब्रह्माजीने तामस सर्गकी रचना की। तिर्यग्
योनिवाले पशु-पक्षी तथा मृग आदि जन्तुओंको
उत्पन्न किया। उस सर्गको पुरुषार्थका साधक न
मानकर ब्रह्माजीने अपने सनातन स्वरूपसे देवताओंको
(सात्त्विक सर्गको) उत्पन्न किया। तत्पश्चात् उन्होंने
मनुष्योंकी (राजस सर्गकी) सृष्टि की। इसके बाद
दक्ष आदि पुत्रोंको जन्म दिया, जो सृष्टिके कार्यमें
तत्पर हुए। ब्रह्माजीके इन पुत्रोंसे देवताओं, असुरों
तथा मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् भरा हुआ है।
भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक,
तपलोक तथा सत्यलोक—ये सात लोक क्रमशः
एकके ऊपर एक स्थित हैं। विप्रवर ! अतल,
वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल तथा
पाताल—ये सात पाताल क्रमशः एकके नीचे एक
स्थित हैं। इन सब लोकोंमें रहनेवाले लोकपालोंको
भी ब्रह्माजीने उत्पन्न किया। भिन्न-भिन्न देशोंके
कुल पर्वतों और नदियोंकी भी सृष्टि की तथा
वहाँके निवासियोंके लिये जीविका आदि सब
आवश्यक वस्तुओंकी भी यथायोग्य व्यवस्था
की। इस पृथ्वीके मध्यभागमें मेरु पर्वत है, जो
समस्त देवताओंका निवासस्थान है। जहाँ पृथ्वीकी
अन्तिम सीमा है, वहाँ लोकालोक पर्वतकी
स्थिति है। मेरु तथा लोकालोक पर्वतके बीचमें
सात समुद्र और सात द्वीप हैं। विप्रवर ! प्रत्येक
द्वीपमें सात-सात मुख्य पर्वत तथा निरन्तर जल
प्रवाहित करनेवाली अनेक विख्यात नदियाँ भी
हैं। वहाँके निवासी मनुष्य देवताओंके समान
तेजस्वी होते हैं। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मलि, कुश,
क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर—ये सात द्वीपोंके नाम
हैं। वे सब-की-सब देवभूमियाँ हैं। ये सातों द्वीप
सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। क्षारोद, इक्षुरसोद,
सुरोद, घृत, दधि, दुग्ध तथा स्वादु जलसे भरे हुए
वे समुद्र उन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हैं। इन द्वीपों और
समुद्रोंको क्रमशः पूर्व-पूर्वकी अपेक्षा उत्तरोत्तर
दूने विस्तारवाले जानना चाहिये। ये सब लोकालोक
पर्वततक स्थित हैं। क्षार समुद्रसे उत्तर और
हिमालय पर्वतसे दक्षिणके प्रदेशको ‘भारतवर्ष’