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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 27 of 770

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Page 27
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद *
    २५

मध्य अङ्गसे जगत्‌का संहार करनेवाले रुद्र-नामधारी शिवको उत्पन्न किया। साथ ही इस जगत्‌का पालन करनेके लिये उन्होंने अपने बायें अङ्गसे अविनाशी भगवान् विष्णुको अभिव्यक्त

किया। जरा-मृत्युसे रहित उन आदिदेव परमात्माको कुछ लोग 'शिव' नामसे पुकारते हैं। कोई सदा सत्यरूप 'विष्णु' कहते हैं और कुछ लोग उन्हें 'ब्रह्मा' बताते हैं। भगवान् विष्णुकी जो पराशक्ति है, वही जगत्रूपी कार्यका सम्पादन करनेवाली है। भाव और अभाव—दोनों उसीके स्वरूप हैं। वही भावरूपसे विद्या और अभावरूपसे अविद्या कहलाती है। जिस समय यह संसार महाविष्णुसे भिन्न प्रतीत होता है, उस समय अविद्या सिद्ध होती है; वही दुःखका कारण होती है। नारदजी! जब तुम्हारी ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय रूपकी उपाधि नष्ट हो जायगी और सब रूपोंमें एकमात्र भगवान् महाविष्णु ही हैं—ऐसी भावना बुद्धिमें होने लगेगी, उस समय विद्याका प्रकाश होगा। वह अभेद-बुद्धि ही विद्या कहलाती है। इस प्रकार महाविष्णुकी मायाशक्ति उनसे भिन्न प्रतीत होनेपर जन्म-मृत्युरूप संसार-बन्धनको देनेवाली होती है और वही यदि अभेद-बुद्धिसे देखी जाय तो संसार-बन्धनका नाश करनेवाली बन जाती है। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भगवान् विष्णुकी शक्तिसे उत्पन्न हुआ है, इसलिये जङ्गम—जो चेष्टा करता है और स्थावर—जो चेष्टा नहीं करता, वह सम्पूर्ण विश्व भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। जैसे घट, मठ आदि भिन्न-भिन्न उपाधियोंके कारण आकाश भिन्न-भिन्न रूपमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् अविद्यारूप उपाधिके योगसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है। मुने! जैसे भगवान् विष्णु सम्पूर्ण जगत्‌में व्यापक हैं, उसी प्रकार उनकी शक्ति भी व्यापक है; जैसे अङ्गारमें रहनेवाली दाहशक्ति अपने आश्रयमें व्याप्त होकर स्थित रहती है। कुछ लोग भगवान्‌की उस शक्तिको लक्ष्मी कहते हैं तथा कुछ लोग उसे उमा और भारती (सरस्वती) आदि नाम देते हैं। भगवान् विष्णुकी वह परा शक्ति जगत्‌की सृष्टि आदि करनेवाली है। वह व्यक्त और अव्यक्तरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित है। जो भगवान् अखिल विश्वकी रक्षा करते हैं, वे ही परम पुरुष नारायण देव हैं। अतः जो परात्पर अविनाशी तत्त्व है, परमपद भी वही है; वही अक्षर, निर्गुण, शुद्ध, सर्वत्र परिपूर्ण एवं सनातन परमात्मा हैं; वे परसे भी परे हैं। परमानन्दस्वरूप परमात्मा सब प्रकारकी उपाधियोंसे रहित हैं। एकमात्र ज्ञानयोगके द्वारा उनके तत्त्वका बोध होता है। वे सबसे परे हैं। सत्‌, चित् और आनन्द ही उनका स्वरूप है। वे स्वयं प्रकाशमय परमात्मा नित्य शुद्ध स्वरूप हैं तथापि सत्त्व आदि गुणोंके भेदसे तीन स्वरूप धारण करते हैं। उनके ये ही तीनों स्वरूप जगत्‌की सृष्टि, पालन और संहारके कारण होते हैं। मुने! जिस स्वरूपसे भगवान् इस जगत्‌की सृष्टि करते हैं, उसीका नाम