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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

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DevanagariHindipublished770 pages

Page 29 of 770

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Page 29
  • पूर्वभाग-प्रथम पाद *
    २७

समझना चाहिये। वह समस्त कर्मोंका फल देनेवाला है।

नारदजी! भारतवर्षमें मनुष्य जो सात्त्विक, राजसिक और तामसिक तीन प्रकारके कर्म करते हैं, उनका फल भोगभूमियोंमें क्रमशः भोगा जाता है। विप्रवर! भारतवर्षमें किया हुआ जो शुभ अथवा अशुभ कर्म है, उसका क्षणभङ्गुर (बचा हुआ) फल जो जीवोंद्वारा अन्यत्र भोगा जाता है। आज भी देवतालोग भारतभूमिमें जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं। वे सोचते हैं, 'हमलोग कब संचित किये हुए महान् अक्षय, निर्मल एवं शुभ पुण्यके फलस्वरूप भारतवर्षकी भूमिपर जन्म लेंगे और कब वहाँ महान् पुण्य करके परम पदको प्राप्त होंगे। अथवा वहाँ नाना प्रकारके दान, भाँति-भाँतिके यज्ञ या तपस्याके द्वारा जगदीश्वर श्रीहरिकी आराधना करके उनके नित्यानन्दमय अनामय पदको कब प्राप्त कर लेंगे।' नारदजी! जो भारतभूमिमें जन्म लेकर भगवान् विष्णुकी आराधनामें लग जाता है, उसके समान पुण्यात्मा तीनों लोकोंमें कोई नहीं है। भगवान्के नाम और गुणोंका कीर्तन जिसका स्वभाव बन जाता है, जो भगवद्भक्तोंका प्रिय होता है अथवा जो महापुरुषोंकी सेवा-शुश्रूषा करता है, वह देवताओंके लिये भी वन्दनीय है। जो नित्य भगवान् विष्णुकी आराधनामें तत्पर है अथवा हरि-भक्तोंके स्वागत-सत्कारमें संलग्न रहता है और उन्हें भोजन कराकर बचे हुए (श्रेष्ठ) अन्नका स्वयं सेवन करता है, वह भगवान् विष्णुके परम पदको प्राप्त होता है। जो अहिंसा आदि धर्मोंके पालनमें तत्पर होकर शान्तभावसे रहता है और भगवान्के 'नारायण, कृष्ण तथा वासुदेव' आदि नामोंका उच्चारण करता है, वह श्रेष्ठ इन्द्रादि देवताओंके लिये भी वन्दनीय है। जो मानव 'शिव, नीलकण्ठ तथा शङ्कर' आदि नामोंद्वारा भगवान् शिवका स्मरण करता तथा सदा सम्पूर्ण जीवोंके हितमें संलग्न रहता है, वह (भी) देवताओंके लिये पूजनीय माना गया है। जो गुरुका भक्त, शिवका ध्यान करनेवाला, अपने आश्रम-धर्मके पालनमें तत्पर, दूसरोंके दोष न देखनेवाला, पवित्र तथा कार्यकुशल है, वह भी देवेश्वरोंद्वारा पूज्य होता है। जो ब्राह्मणोंका हित-साधन करता है, वर्णधर्म और आश्रमधर्ममें श्रद्धा रखता है तथा सदा वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर होता है, उसे 'पङ्क्तिपावन' मानना चाहिये। जो देवेश्वर भगवान् नारायण तथा शिवमें कोई भेद नहीं देखता, वह ब्रह्माजीके लिये भी सदा वन्दनीय है; फिर हमलोगोंकी तो बात ही क्या है? नारदजी! जो गौओंके प्रति क्षमाशील—उनपर क्रोध न करनेवाला, ब्रह्मचारी, परायी निन्दासे दूर रहनेवाला तथा संग्रहसे रहित है, वह भी देवताओंके लिये पूजनीय है। जो चोरी आदि दोषोंसे पराङ्मुख है, दूसरोंद्वारा किये हुए उपकारको याद रखता है, सत्य बोलता है, बाहर और भीतरसे पवित्र रहता है तथा दूसरोंकी भलाईके कार्यमें सदा संलग्न रहता है, वह देवता और असुर सबके लिये पूजनीय होता है। जिसकी बुद्धि वेदार्थ श्रवण करने, पुराणकी कथा सुनने तथा सत्सङ्गमें लगी होती है, वह भी इन्द्रादि देवताओंद्वारा वन्दनीय होता है। जो भारतवर्षमें रहकर श्रद्धापूर्वक पूर्वोक्त प्रकारके अनेकानेक सत्कर्म करता रहता है, वह हमलोगोंके लिये वन्दनीय है।

जो शीघ्र ही इन पुण्यात्माओंमेंसे किसी एककी श्रेणीमें अपने-आपको ले जानेकी चेष्टा नहीं करता, वह पापाचारी एवं मूढ़ ही है; उससे बढ़कर बुद्धिहीन दूसरा कोई नहीं है। जो भारतवर्षमें जन्म लेकर पुण्यकर्मसे विमुख होता है, वह अमृतका घड़ा छोड़कर विषके पात्रको