संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context२३२ * संक्षिप्त नारदपुराण *
(नमक)। (पौ+अकः=पावकः—अग्नि)—ये अयादि संधि कहलाते हैं¹। ते+आद्याः=त आद्याः (वे प्रथम हैं)। विष्णो+एह्यात्र=विष्ण एह्यात्र (भगवन् विष्णो! यहाँ पधारिये)। तस्मै+अर्थः=तस्मा अर्थः (उनके लिये अर्घ्य)। गुरौ+अधः=गुरा अधः (गुरुके समीप नीचे)। इन उदाहरणोंमें यलोप और वलोप हुए हैं²॥ २७॥
हरेऽव विष्णोऽवेत्येषादसो मादप्यमी अघाः।
शौरी एतौ विष्णू इमौ दुर्गे अमू नो अर्जुनः॥ २८॥
आ एवं च प्रकृत्यैते तिष्ठन्ति मुनिसत्तम।
हरे+अव=हरेऽव (भगवन्! रक्षा कीजिये)। विष्णो+अव=विष्णोऽव (विष्णो! रक्षा कीजिये)। यह पूर्वरूप संधि है³। अदस् शब्दसम्बन्धी मकारसे परे यदि दीर्घ ‘ई’ और ‘ऊ’ हों तो वे ज्यों-के-त्यों रह जाते हैं। इस अवस्थाको प्रकृतिभाव कहते हैं। जैसे अमी+अघाः (ये पापी हैं)⁴, शौरी+एतौ=(ये दोनों श्रीकृष्ण-बलराम हैं), विष्णू+इमौ=(ये दोनों विष्णुरूप हैं), दुर्गे+अमू=(ये दोनों दुर्गरूप हैं)। ये भी प्रकृतिभावके ही उदाहरण हैं।⁵ नो+अर्जुनः (अर्जुन नहीं है), आ+एवम् (ऐसा ही है)—इनमें भी सन्धि नहीं होती⁶। मुनिश्रेष्ठ नारद! ‘अमी+अघाः’ से लेकर यहाँतकके सभी उदाहरण ऐसे हैं, जो अपनी प्रकृतावस्थामें ही रहते हैं॥ २८१/२ ॥
षडत्र षण्मातरश्च वाक्छूरो वाग्घरिस्तथा॥ २९॥
अब व्यञ्जन सन्धिके उदाहरण दिये जाते हैं। षट्+अत्र=षडत्र⁷ (यहाँ छः हैं)। षट्+मातरः=षण्मातरः⁸ (छः माताएँ)। वाक्+शूरः=वाक्छूरः⁹
१. नियम यह है कि ‘ए’, ‘ओ’, ‘ऐ’, ‘औ’—इनसे परे कोई भी स्वर हो तो इनके स्थानमें क्रमशः ‘अय्, अव्, आय्, और आव्’ आदेश होते हैं। २. नियम यह है कि कोई भी स्वर परे रहनेपर अवर्णपूर्वक पदान्त य, व का लोप हो जाता है। यहाँ पूर्वोक्त नियमानुसार पहले अय्, अव् आदि आदेश होते हैं; फिर अभी बताये हुए नियमके अनुसार य, व का लोप हो जाता है। यहाँ ‘य’-लोप या ‘व’-लोप होनेपर ‘त आद्या’ ‘विष्ण एह्यात्र’ आदिमें पुनः दीर्घ एवं गुण आदि संधि नहीं हो सकती; क्योंकि इन संधियोंकी दृष्टिमें य-लोप, व-लोप असिद्ध हैं; इसलिये इनकी प्रवृत्ति ही नहीं होती। सारांश यह कि इन स्थलोंमें पुनः संधिका निषेध है। ३. नियम यह है कि पदान्त एकार और ओकारके बाद यदि ह्रस्व अकार हो तो वह पूर्ववर्ती स्वरमें मिल जाता है। ४. इस उदाहरणमें यण्सन्धि प्राप्त हुई थी; किंतु अभी बताये हुए नियमके अनुसार प्रकृतिभाव होनेसे सन्धि नहीं हुई।
५. पूर्वके दो उदाहरणोंमें यण्की और अन्तिम उदाहरणमें पूर्वरूपकी प्राप्ति थी; परंतु सन्धिका निषेध हो गया। नियम यह है कि ईकारान्त, ऊकारान्त और एकारान्त द्विवचनका प्रकृतिभाव होता है; अतः वहाँ सन्धि नहीं होती है। ६. पहलेमें पूर्वरूप और दूसरेमें वृद्धि सन्धिकी प्राप्ति थी; परंतु प्रकृतिभाव हो गया। नियम यह है किओकारान्त निपात और एक स्वरवाले निपात जैसे हैं, वैसे ही रह जाते हैं। ७. इसमें षट् के ‘ट्’ की जगह ड् हुआ है। नियम यह है कि झ, भ, घ, ढ, ध, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स—इनमेंसे यदि कोई अक्षर पदान्तमें हो तो उसके स्थानमें ज, ब, ग, ड, द—इनमेंसे कोई अक्षर योग्यताके अनुसार होता है। योग्यताका अभिप्राय स्थानकी समानतासे है। जैसे ‘ट’ का स्थान मूर्धा है, अतः उसकी जगह मूर्धा स्थानका ‘ड’ अक्षर ही हुआ। ‘ज’, ‘ब’ आदिके स्थान भिन्न हैं,, इसलिये वे नहीं हुए। ८. इसमें ‘ट्’ की जगह ‘ण्’ आदेश हुआ है। ‘क’ से लेकर ‘म’ तकके किसी भी अक्षरके बाद यदि अनुनासिक वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) हों तो पूर्ववर्ती अक्षर यदि पदान्तमें हो तो उसके स्थानमें अनुनासिक हो जाता है। जो अक्षर जिस वर्गका है, उसके स्थानमें उसी वर्गका पाँचवाँ अक्षर अनुनासिक होता है। इसीलिये उक्त उदाहरणमें ‘ट्’ की जगह उसी वर्गका पाँचवाँ अक्षर ‘ण्’ हुआ। ९. यहाँ ‘श्’ के स्थानमें ‘छ्’ हुआ है। ऊपर लिखे हुए ‘झ’ से ‘प’ तकके अक्षरोंके बाद यदि ‘श्’ हो तो उसकी जगह ‘छ्’ हो जाता है; किंतु उस ‘श’ के बाद कोई स्वर अथवा ‘ह, य, व, र’—ये अक्षर होने चाहिये। यही इस सन्धिका नियम है।