संक्षिप्त नारद पुराण
Sankshipt Narada Purana
by महर्षि वेदव्यास
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 233 of 770
Read in context- पूर्वभाग-द्वितीय पाद * २३१
भूते लुङतिपत्तौ च क्रियाया लृङ् प्रकीर्तितः ।
सिद्धोदाहरणं विद्धि संहितादिपुरःसरम् ॥ २४ ॥
सामान्य भूतकालमें लुङ् लकारका प्रयोग करना चाहिये। हेतुहेतुमद्भाव आदि जो लिङ्के निमित्त हैं, उन्हींके होनेपर भविष्य-अर्थमें लृङ् लकारका प्रयोग होता है; किंतु यदि क्रियाकी असिद्धि सूचित होती हो तभी ऐसा होना उचित है। मुने ! [ अब संधिका प्रकरण आरम्भ करते हैं—] संधिके सिद्ध उदाहरण संहिता आदि ग्रन्थोंके अनुसार समझो ॥ २४ ॥
दण्डाग्रं च दधीदं च मधूदकं पितृषभः ।
होतृकारस्तथा सेयं लाङ्गलीषा मनीषा ॥ २५ ॥
गङ्गोदकं तवल्कार ऋणार्णं च मुनीश्वर ।
शीतार्तश्च मुनिश्रेष्ठ सैन्द्रः सौकार इत्यपि ॥ २६ ॥
पहले स्वर-संधिके उदाहरण दिये जाते हैं—
दण्ड+अग्रम्=दण्डाग्रम् (डंडेका सिरा)। दधि+इदम्=दधीदम् (यह दही)। मधु+उदकम्=मधूदकम् (मधु और जल)। पितृ+ऋषभः=पितृषभः (पितृवर्गमें श्रेष्ठ)। होतृ+लृकारः=होतृकारः (होताका लृकार)¹।
इसी प्रकार 'मनीषा'के साथ 'लाङ्गलीषा' भी सिद्धसंधि है।² मुनीश्वर ! गङ्गा+उदकम्=गङ्गोदकम् (गङ्गाजल), तव+लृकारः=तवल्कारः (तुम्हारा लृकार), सा+इयम्=सेयम् (वह यह—स्त्री)।³ स+ऐन्द्रः=सैन्द्रः (वह इन्द्रका भाग)। स+औकारः=सौकारः (वह औकार)। ऋण+ऋणम्=ऋणार्णम् (ऋणके लिये ऋण)। शीत+ऋतः=शीतार्तः (शीतसे युक्त)। कृष्ण+एकत्वम्=कृष्णैकत्वम् (कृष्णकी एकता)। गङ्गा+ओघः=गङ्गौघः (गङ्गाकी जलराशिका प्रवाह)—ये वृद्धि संधिके उदाहरण हैं⁴ ॥ २५-२६ ॥
वध्वासनं पित्रर्थो नायको लवणस्तथा ।
त आद्या विष्णवे ह्यत्र तस्मा अर्थो गुरा अथः ॥ २७ ॥
दधि+अत्र=दध्यत्र (यहाँ दही है), वधू+आसनम्=वध्वासनम् (बहूका आसन), पितृ+अर्थः=पित्रर्थः (पिताका धन), लृ+आकृतिः=लाकृतिः (देवजातिकी माताका स्वरूप)—ये यण्संधिके उदाहरण हैं⁵। (हरे+ए=हरये—भगवान्के लिये)। नै+अकः=नायकः (स्वामी)। लो+अणः=लवणः
१. ये पाँच उदाहरण दीर्घसंधिके हैं। नियम यह है कि अ, इ, उ, ऋ और लृ—ये स्वर दीर्घ हों या ह्रस्व, यदि अपने सवर्ण स्वरको समीप एवं परवर्ती पायें तो दोनों मिल जाते हैं और उन दोनोंके स्थानपर एक ही दीर्घस्वर हो जाता है। ऋ और लृ असमान प्रतीत होनेपर भी परस्पर सवर्ण माने गये हैं। अतः ऋ+लृके मिलनेपर एक ही 'ऋ' बनता है, जैसा कि 'होतृकारः' में दिखाया गया है।
२. लाङ्गल+ईषा=लाङ्गलीषा। मनस्+ईषा=मनीषा। ये ही इनके पदच्छेद हैं। पहलेमें 'लाङ्गल' शब्दके अन्तका 'अ' ईषाके ईकारमें मिलकर तद्रूप हो गया है। दूसरेमें 'मनस्' के अन्तका 'अस्' भाग ईषाके ईकारका स्वरूप बन गया है। ऐसी संधिको पररूप कहते हैं। 'मनीषा' का अर्थ बुद्धि और 'लाङ्गलीषा' का अर्थ हरिस—हलका ईषादण्ड है। वार्तिककारने मनीषा आदि शब्दोंको 'शकन्धू' आदि गण (समुदाय)-में सम्मिलित किया है। ऐसे शब्द जो प्राचीन ग्रन्थोंमें प्रयुक्त हुए हैं और जिनके साधनकी कोई विशेष पद्धति नहीं है, उन्हें निपातनात् सिद्ध माना गया है। ३. ये गुणसंधिके उदाहरण हैं। नियम यह है कि 'अ' या 'आ' से परे 'इ' 'उ' अथवा 'ऋ' हों तो वह क्रमशः 'ए' 'ओ' अथवा 'अर्' रूप धारण करता है। ये आदेश दो अक्षरोंके स्थानपर अकेले होते हैं। ४. नियम यह है कि 'अ' अथवा 'आ' से परे 'ए', 'ओ' अथवा 'ऋ' हो तो दो अक्षरोंके स्थानपर क्रमशः 'ऐ', 'औ' एवं 'आर्' आदेश होते हैं। 'ए' या 'ओ' की जगह 'ऐ', 'और' हों तो भी वैसा ही रूप बनता है। 'ऋ' के स्थानमें 'आर्' होनेके स्थल परिगणित हैं।
५. नियम यह है कि 'इ' 'उ' 'ऋ' 'लृ'—ये चार अक्षर दीर्घ हों या ह्रस्व, इनसे परे कोई भी असवर्ण (असमान) स्वर होनेपर इन 'इ' कार आदिके स्थानपर क्रमशः य्, व्, र्, ल् आदेश होते हैं।