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संक्षिप्त नारद पुराण

संक्षिप्त नारद पुराण

Sankshipt Narada Purana

by महर्षि वेदव्यास

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariHindipublished770 pages

Page 235 of 770

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Page 235

* पूर्वभाग-द्वितीय पाद *
२३३


(बोलनेमें बहादुर)। वाक्+हरिः=वाग्घरिः^१ (वाणीरूप भगवान्) ॥२९॥

हरिशेते विभुश्चिन्त्यस्तच्छेषो यच्चरस्तथा।
प्रश्नस्त्वथ हरिष्षष्ठः कृष्णाष्टीकत इत्यपि ॥३०॥

हरिस्+शेते=हरिशेते^२ (श्रीहरि शयन करते हैं)। विभुस्+चिन्त्यः=विभुश्चिन्त्यः^३ (सर्वव्यापी परमेश्वर चिन्तन करने योग्य हैं)। तत्+शेषः=तच्छेषः^४ (उसका शेष)। यत्+चरः=यच्चरः^५ (जिसमें चलनेवाला)। प्रश्+नः=प्रश्नः^६ (सवाल)। हरिस्+षष्ठः=हरिष्षष्ठः^७ (श्रीहरि छठे हैं) तथा कृष्णः+टीकते=कृष्णाष्टीकते^८ (श्रीकृष्ण जाते हैं) इत्यादि ॥३०॥

भवान्षष्ठश्च षट् सन्तः षट् ते तल्लेप एव च।
चक्रिंश्छिन्धि भवाञ्छौरिर्भवाञ्शौरिरिहेत्यपि ॥३१॥

भवान्+षष्ठः (आप छठे हैं)। इसमें पूर्व नियमके अनुसार प्राप्त होनेपर तवर्गका टवर्ग नहीं होता^९। इसी तरह षट् सन्तः (छः सत्पुरुष) और षट् ते (वे छः हैं) इत्यादिमें भी ष्टुत्व नहीं हुआ है^{१०}। तत्+लेपः=तल्लेपः^{११} (उसका लेप)। चक्रिन्+छिन्धि=चक्रिंश्छिन्धि^{१२} (चक्रधारी प्रभो! मेरा बन्धन काटिये)। भवान्+शौरिः=भवाञ्छौरिः, भवाञ्शौरिः इह (आप श्रीकृष्ण यहाँ हैं), (भवाञ्छ्छौरिः, भवाञ्श्शौरिः) इस पदच्छेदमें ये चार रूप बनते हैं^{१३}॥३१॥

सम्यङ्ङनन्तोऽङ्गच्छाया कृष्णं वन्दे मुनीश्वर।
तेजांसि मंस्यते गङ्गा हरिश्चेत्तामरशिवः ॥३२॥

सम्यङ्+अनन्तः=सम्यङ्ङनन्तः (अच्छे शेषनाग), सुगण्+ईशः=सुगण्णीशः (अच्छे गणोंके स्वामी)। सन्+अच्युतः=सन्नच्युतः^{१४} (नित्य सत्वरूप श्रीहरि)। अङ्ग+छाया=अङ्गच्छाया^{१५} (शरीरकी परछाईं) कृष्णम्+वन्दे=कृष्णं वन्दे^{१६} (श्रीकृष्णको प्रणाम


१.उपर्युक्त 'झ'से 'प' तकके अक्षरोंके बाद यदि 'ह' हो तो उस 'ह' के स्थानमें पूर्ववर्ती अक्षरके वर्गका चौथा वर्ण हो जाता है। इस नियमके अनुसार उक्त उदाहरणमें 'क्' के बाद 'ह' होनेसे 'ह'के स्थानमें कवर्गका चौथा अक्षर 'घ्' हो गया है और 'क्' की जगह पूर्वोक्त नियमानुसार 'ग्' हो गया॥
२-३-४-५. शकार और चवर्गका योग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः शकार और चवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार पूर्व दो उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'श्' हुआ है और शेष दोमें तवर्गकी जगह चवर्ग हुआ है। शेषके शकारका छकार हुआ है। नियम 'वाक्छूरः में, बताया गया है। ६. शके बाद तवर्ग हो तो उसकी जगह चवर्ग नहीं होता; अतः 'प्रश्नः' में न ज्यों-का-त्यों रह गया है। ७-८. षकार और टवर्गसे संयोग होनेपर सकार और तवर्गके स्थानमें क्रमशः षकार और टवर्ग होते हैं। इस नियमके अनुसार दोनों उदाहरणोंमें 'स्' की जगह 'ष' हुआ है।
९. क्योंकि षकार परे रहनेपर तवर्गके टवर्ग होनेका निषेध है। १०. क्योंकि पदान्त टवर्गसे परे नाम्-भिन्न सकार और तवर्गके स्थानमें षकार और टवर्ग नहीं होते। ऐसा निषेध है। ११. यहाँ तकारके स्थानमें लकार आदेश हुआ। नियम यह है कि लकार परे रहनेपर तवर्गके स्थानमें 'ल्' हो जाता है।
१२. इसमें 'न्' के स्थानमें 'र्', 'र' का विसर्ग एवं उसका दन्त्य 'स्' होकर फिर छकारके योगमें उसका तालव्य 'श्' हो गया तथा उसके पूर्व अनुस्वार एवं अनुनासिक हुआ। नियम यह है कि छ, ठ, थ, च, ट, त-ये अक्षर परे हों तो नान्त पदके नकारका 'र्' हो, और उसके पूर्व स्वरका विकल्पसे अनुनासिक अथवा 'र्' से परे अनुस्वारका आगम हो। १३.नियम यह है कि शकार परे रहनेपर नान्त पदके आगे 'त्' बढ़ जाता है। शेष परिवर्तन पूर्वोक्त नियमके अनुसार होते हैं।
१४. इन उदाहरणोंमें ङ्, ण्, न् एकसे दो हो गये हैं। नियम यह है कि ह्रस्वसे परे यदि 'ङ' 'ण्' या 'न्' हो और उसके बाद भी कोई स्वर हो तो वे एकसे दो हो जाते हैं। १५. यहाँ छ के पहले आधा च् बढ़ गया है। नियम यह है कि ह्रस्वसे परे छ होनेपर उसके पहले आधा च् बढ़ जाता है। १६. यहाँ म् के स्थानमें अनुस्वार हो गया है। कोई भी हल् अक्षर परे हो तो पदान्तमें स्थित म् का अनुस्वार हो जाता है।