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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 99 of 178

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प्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप ९७
बतलाया जा सकता, परन्तु जब कोई प्रेममदसे छके हुए
भाग्यवान् महापुरुष तन-मनकी सुधि भुलाकर दिव्य
उन्मत्तवत् चेष्टा करने लगते हैं तब प्रेमका कुछ-कुछ प्रकाश
लोगोंको प्रकट दीखने लगता है। उस समय ऐसे महात्माकी
केवल वाणीसे और नेत्रोंसे ही नहीं, शरीरके रोम-रोमसे
प्रेमकी किरणें अपने-आप ही निकलने लगती हैं। यह प्रेमका
प्राकट्य साक्षात् भगवान्‌का ही प्रकाश है। ऐसा प्रकाश किसी
बिरले ही प्रेमी महापुरुषमें होता है।
गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षणवर्धमानमविच्छिन्नं
सूक्ष्मतरमनुभवरूपम् ॥ ५४ ॥
५४-यह प्रेम गुणरहित है, कामनारहित है, प्रतिक्षण
बढ़ता रहता है, विच्छेदरहित है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर है और
अनुभवरूप है।
किसी गुणको देखकर जो प्रेम होता है वह तो गुण न
दीखनेपर नष्ट हो जा सकता है। परन्तु असली प्रेममें गुणोंकी
अपेक्षा नहीं है। प्रेमीको अपने प्रेमास्पदमें गुण-दोष देखनेका
अवकाश ही कहाँ मिलता है, वहाँ तो स्वाभाविक सहज प्रेम
होता है। अथवा यों कह सकते हैं कि प्रेम गुणातीत होता
है। वह तीनों गुणोंके दायरेसे परेकी वस्तु है।
प्रेममें कुछ भी कामना नहीं होती, क्योंकि प्रेममें प्रेमास्पदको
सुखी देखनेकी एक इच्छाको छोड़कर अन्य किसी स्वार्थकी
वासना ही नहीं रहती। उसका तो परम अर्थ केवल प्रेमास्पद ही
है। जहाँ कुछ भी पानेकी वासना है वहाँ तो प्रेमका पवित्र आसन
कुटिल कामके द्वारा कलंकित हो रहा है। अतएव प्रेममें
कामनाका लेश भी नहीं है।