प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 98 of 178
Read in context९६ प्रेम-दर्शन
है तब तो डूबनेवालेकी लाशका पता लगना भी कठिन होता
है। इसी प्रकार जो प्रेमसमुद्रमें डूब चुका है, वह कुछ कह ही
नहीं सकता और ऊपर-ऊपर डुबकियाँ मारने और डूबने-
उतरानेवाले जो कुछ कहते हैं सो केवल ऊपर-ऊपरकी ही
बात कहते हैं—
डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान।
गहरौ प्रेम-समुद्र कोउ डूबै चतुर सुजान॥
मूकास्वादनवत् ॥ ५२ ॥
५२-गूँगेके स्वादकी तरह।
जैसे गूँगा गुड़ खाकर प्रसन्न होता है, हँसता है, परन्तु
गुड़़का स्वाद नहीं बतला सकता; इसी प्रकार प्रेमी महात्मा
प्रेमका अनुभव कर आनन्दमें निमग्न हो जाते हैं, परन्तु
अपने उस अनुभवका स्वरूप दूसरे किसीको भी बतला नहीं
सकते। इस प्रेममें तन्मयता होती है। इसलिये प्रेमी यह नहीं
जानता कि मैं क्या हूँ और क्या जानता हूँ। इसीसे श्रीराधाने
एक समय कहा है कि हे सखि! मैं कृष्णप्रेमकी बात कुछ
भी नहीं जानती, नहीं समझती और जो कुछ जानती हूँ उसे
प्रकट करनेयोग्य भाषा मेरे पास नहीं है। मैं तो इतना ही
जानती हूँ कि जब हृदयके अंदर उनका स्पर्श होता है, तभी
मेरा सारा ज्ञान चला जाता है।
प्रकाशते * क्वापि पात्रे ॥ ५३ ॥
५३-किसी बिरले योग्य पात्रमें ( प्रेमी भक्तमें ) ऐसा प्रेम
प्रकट भी होता है।
यह तो निश्चित है कि वाणीद्वारा प्रेमका स्वरूप नहीं
- पाठभेद 'प्रकाशयते' ।