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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 100 of 178

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Page 100

९८ प्रेम-दर्शन
सच्चा प्रेम कभी घटता तो है ही नहीं, वरं वह सदा
बढ़ता ही रहता है। प्रेममें कहीं परिसमाप्ति नहीं है। प्रेमीका
सदा यही भाव रहता है कि मुझमें प्रेमकी कमी ही है।
किसी भी अवस्थामें उसे अपना प्रेम बढ़ा हुआ नहीं दीखता,
अतएव उसकी प्रत्येक चेष्टा स्वाभाविक ही प्रेम बढ़ानेकी
होती है। इस विच्छेदरहित प्रेमकी सतत वृद्धिका क्रम कभी
टूटता ही नहीं। यह विशुद्ध प्रेम दिन दूना, रात चौगुना बढ़ता
ही रहता है।
प्रेम सदा बढ़िबौ करै, ज्यों ससिकला सुबेष।
पै पूनौ यामें नहीं, ताते कबहुँ न सेष॥
यह प्रेम हृदयकी गुप्त गुहामें रहनेवाला होनेके कारण
सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर होता है और केवल अनुभवमें ही आता
है। प्रेमी रसखानजी मानो इसी सूत्रका अनुवाद करते हुए
कहते हैं—
बिनु जोबन गुन रूप धन, बिनु स्वारथ हित जानि।
सुद्ध, कामना ते रहित, प्रेम सकल रसखानि॥
अति सूच्छम, कोमल अतिहि, अति पतरो, अति दूर।
प्रेम कठिन सबते सदा, नित इकरस भरपूर॥
रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ, अचल महान।
सदा एक रस बढ़त नित सुद्ध प्रेम रसखान॥
यह प्रेम परम आनन्दमय है और आनन्दमय श्रीहरिके साथ
मिलाकर प्रेमीको आनन्दमय बना देता है।
तत्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति *
तदेव चिन्तयति ॥ ५५ ॥

  • किसी-किसी प्रतिमें "तदेव भाषयति" नहीं है।