प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७३
अन्तःकरणकी शुद्धि और मुक्तिकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं।
लीलाविहारी भगवान्को सीधा वशमें करनेवाला तो केवल एक
सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, अनन्य और विशुद्ध प्रेम ही है, जो इन
साधनोंमेंसे किसीसे नहीं मिलता; वह तो केवल भगवत्संगी प्रेमी
महापुरुषोंकी महती कृपासे ही मिलता है।
भगति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥
हाँ, यदि श्रीभगवान् चाहें तो स्वयमेव अपना प्रेम दे सकते
हैं; उनकी कृपाके लेशमात्रसे ही प्रेम मिल सकता है। गोसाईंजीने
कहा है—
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ॥
परन्तु नित्य कृपावर्षा करनेवाले भगवान्का कृपाबिन्दु भी
भगवदीय महात्माओंकी कृपासे ही जीवोंको मिल सकता है।
अतएव ऐसे प्रेमी सन्तोंका संग ही प्रधान साधन है, परन्तु ऐसा
संग प्राप्त होना अपने वशकी बात नहीं! इसीसे देवर्षि नारदजी
अगले सूत्रमें महत्संगको दुर्लभ बतलाते हैं—
महत्संगस्तु दुर्लभोऽगम्योऽमोघश्च ॥ ३९॥
३९-परन्तु महापुरुषोंका संग दुर्लभ, अगम्य और
अमोघ है।
संसारमें स्वधर्मपरायण, सदाचारी, साधुस्वभाव, दैवी सम्पत्तिवान्
पुरुषोंकी प्राप्ति बहुत दुर्लभ है। सच्चे हीरोंकी भाँति जमातों और
उपदेशकोंमें सच्चे साधु थोड़े ही होते हैं; पर खोज करनेपर संसारमें
सदाचारी, कर्मकाण्डी और कुछ ज्ञानी पुरुष तो मिल भी सकते हैं।
परन्तु ऐसे सच्चे प्रेमी महात्मा बहुत ही कम मिलते हैं, जिनकी
कृपामात्रसे परमदुर्लभ योगि-ज्ञानि-जनवांछित भगवत्प्रेमकी प्राप्ति
हो जाती हो। इसीलिये ऐसे महात्माओंका मिलन बहुत दुर्लभ माना