प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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यह उस सत्संगकी महिमा नहीं है जो अन्तःकरणकी शुद्धि
करके मोक्षप्राप्ति करवाता है। क्योंकि यहाँ तो मोक्षके साथ
लवमात्रके ऐसे सत्संगकी तुलना करना भी असंगत बतलाया गया
है। अतएव यहाँ उन भगवत्तत्त्वके ज्ञाता होकर भगवत्-प्रेमके
रंगमें रँगे हुए मोक्षसंन्यासी भगवत्संगी (सर्वैश्वर्यपूर्ण मधुरतम
लीलाविहारी भगवान्के नित्य लीलासंगी) प्रेमी सन्तोंकी उस
कृपाका उल्लेख है, जो केवल मुक्ति ही नहीं, भगवान्के प्रेमरूपी
भक्तिकी प्राप्ति भी सहज ही करवा देती है। क्योंकि मुक्तिको
तो ऐसे प्रेमी चाहते ही नहीं। वरं मुक्तिकी चाहको ही वे प्रेमरूपा
भगवद्भक्तिकी उत्पत्तिमें बाधा देनेवाली पिशाचिनी समझकर
उसका तिरस्कार किया करते हैं। ऐसे प्रेमी भक्तोंकी कृपा जिनपर
होती है, जो पुरुष ऐसे भक्तोंका संग प्राप्त कर लेता है, योग और
ज्ञान आदिसे भी वशमें न होनेवाले भगवान् (सहज ही) उसके
वशमें हो जाते हैं। इसीलिये स्वयं भगवान् अपने प्रेमी भक्त
उद्धवसे कहते हैं—
न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः।
यथावरुन्धे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम्॥
(श्रीमद्भा० ११।१२।१-२)
'दूसरे समस्त संगोंका निवारण करनेवाले 'सत्संगसे' मैं जैसा
वशीभूत होता हूँ वैसा योग, ज्ञान, धर्म, वेदाध्ययन, तप, त्याग,
इष्टापूर्त, दक्षिणा, व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ, यम और नियम किसीसे
नहीं होता।'
इसका कारण यह है कि अन्यान्य सब साधन, सकामभावसे
होनेपर भोग और स्वर्गादिकी और निष्कामभावसे होनेपर