प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 73 of 178
Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ७१
विषय और विषयासक्तिका त्याग करके अखण्ड भजन और
श्रवण-कीर्तनका साधन बतलाया जानेके बाद अब एक ऐसा
साधन बतलाया जाता है, जिस एकके प्रतापसे ही पहले तीनों
अपने-आप हो जाते हैं—वह साधन है 'महापुरुषोंकी कृपा'।
महापुरुष तो कृपालु ही होते हैं, परन्तु श्रद्धा-विश्वासपूर्वक उनका
संग करना बड़ा कठिन है। महापुरुषोंका संग प्राप्त होनेपर विषय
तो आप ही छूट जाते हैं। उनके संगसे श्रवण-कीर्तन भी करना
ही पड़ता है और रात-दिन जो कुछ सुनने, कहने और देखनेमें
आता है, उसका स्मरण अनिवार्य है ही। परन्तु यह स्मरण रखना
चाहिये कि यहाँ जिन महापुरुषोंकी कृपामात्रसे ही फलरूपा
प्रेमभक्तिकी प्राप्ति बतलायी है, वे महापुरुष केवल शास्त्रज्ञानी
और सदाचारी ही नहीं होते, भगवान्के स्वरूप-तत्त्वको यथार्थरूपसे
जानकर उनमें अनन्य प्रेम करनेवाले भक्त होते हैं। ऐसे प्रेमी
भक्तोंके संगकी बड़ी महिमा है। इसीसे यज्ञ-धूमसे जिनके शरीर
धूमैले हो गये हैं, ऐसे कर्मकाण्डी विज्ञानविद् ऋषि भगवच्चरणकमल-
रसामृतका पान करानेवाले प्रेममूर्ति सूतजीसे कहते हैं—
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः॥
(श्रीमद्भा० १।१८।१३)
‘हे सौम्य! भगवत्संगी प्रेमियोंके निमेषमात्रके संगकी तुलना,
स्वर्गादिकी तो बात ही क्या, पुनर्जन्मका नाश करनेवाली मुक्तिके
साथ भी नहीं की जा सकती; फिर मर्त्यलोकके राज्यादि
सम्पत्तिकी तो बात ही क्या है? इसीके आधारपर रामचरितमानसमें
कहा गया है—
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥