प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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'अहो, जिसकी जिह्वापर तुम्हारा पवित्र नाम रहता है वह चाण्डाल
भी श्रेष्ठ है; क्योंकि जो तुम्हारे नामका कीर्तन करते हैं उन श्रेष्ठ
पुरुषोंने तप, यज्ञ, तीर्थस्नान, वेदाध्ययन सब कुछ कर लिया।'
पतितः स्खलितश्चार्तः क्षुत्त्वा वा विवशोब्रुवन्।
हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात्॥
संकीर्त्यमानो भगवाननन्तः
श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम्।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं
यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवातः॥
(१२।१२।४६-४७)
'कोई भी मनुष्य गिरते, पड़ते, छींकते और दुःखसे पीड़ित होते
समय परवश होकर भी यदि ऊँचे स्वरसे 'हरये नमः' पुकार उठता
है तो वह सब पापोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्य पर्वतकी गुफाके
अन्धकारका भी नाश कर देता है और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको
छिन्न-भिन्न करके लुप्त कर देता है, इसी प्रकार अनन्तभगवान्का
नाम-कीर्तन अथवा उनके प्रभावका श्रवण हृदयमें प्रवेश करके
समस्त दुःखोंका अन्त कर देता है।'
यह तो विवश होकर नाम लेनेका फल है। प्रेमसे लेनेपर तो
कहना ही क्या। इसीसे गोसाईंजी कहते हैं—
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥
सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥
अतएव भक्तिकी प्राप्तिके लिये नित्य-निरन्तर भगवान्के नाम-
गुण-यशका कीर्तन, श्रवण और चिन्तन निःसन्देह परम साधन है।
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा ॥ ३८ ॥
३८-परन्तु (प्रेमभक्तिकी प्राप्तिका साधन) मुख्यतया (प्रेमी)
महापुरुषोंकी कृपासे अथवा भगवत्कृपाके लेशमात्रसे होता है।