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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

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६६ प्रेम-दर्शन
स्वतः ही भगवत्परायण हो जायँगे। अतएव कान और जीभको
भगवान्‌के नाम-गुण-लीलादिके सुनने और गानेमें ही निरन्तर लगाये
रखना चाहिये। यही जीवनको सफल बनानेके साधन हैं। केवल
जीवित रहने, श्वास लेने, खाने और मैथुन करने आदिमें ही
जीवनकी सफलता मानी जाय तो क्या वृक्ष जीवित नहीं रहते ?
क्या लोहारकी धोंकनी श्वास नहीं लेती और क्या पशु भोजन
या मैथुन नहीं करते। इसीलिये श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—
श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः।
न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः॥
बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये
न शृण्वतः कर्णपुटे नरस्य।
जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथाः॥
(२।३।१९-२०)
‘जिसके कर्णपथमें भगवान्‌के नाम-गुणोंने कभी प्रवेश नहीं
किया वह मनुष्यरूपी पशु कुत्ते, विष्ठाभोजी सूअर, ऊँट और
गदहेकी अपेक्षा भी अधिक निन्दनीय है। हे सूतजी! जो कान
भगवान्‌की लीलाका श्रवण नहीं करते, वे सर्पादिके बिलके
समान हैं और जो दुष्टा जिह्वा भगवान्‌की लीला-कथाका गान
नहीं करती वह मेंढककी जीभके समान व्यर्थ बकवाद करनेवाली
है।' इसीका अनुवाद गोस्वामी तुलसीदासजीने किया है—
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहि भवन समाना॥
जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥
श्रीमद्भागवतके अन्तमें कहा गया है—
मृषा गिरस्ता ह्यसतीरसत्कथा
न कथ्यते यद् भगवानधोक्षजः।