प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६५
साथ-ही-साथ मनसे और साथ ही धीमे स्वरसे वाणीसे भी
भगवान्का नाम-जप करता रहे। यह साधन उठते-बैठते, चलते-
फिरते, सोते, खड़े रहते, सब समय किया जा सकता है। अभ्यास
दृढ़ हो जानेपर चित्त विक्षेपशून्य होकर निरन्तर भगवान्के
चिन्तनमें अपने-आप ही लग जायगा। प्रायः सभी प्रसिद्ध भक्तों
और सन्तोंने इस साधनका प्रयोग किया था। महात्मा चरणदासजी
कहते हैं—
स्वासा माहीं जपे तें दुबिधा रहे न कोय।
इसी प्रकार कबीरजी कहते हैं—
साँस साँस सुमिरन करौ, यह उपाय अति नीक।
मतलब यह कि भगवान्के स्वरूप, प्रभाव, रहस्य, गुण,
लीला अथवा नामका चिन्तन निरन्तर तैलधाराकी भाँति होते
रहना चाहिये। यही अखण्ड भजन है।
लोकेऽपि भगवद्गुणश्रवणकीर्त्तनात् ॥ ३७ ॥
३७-लोकसमाजमें भी भगवत्-गुण-श्रवण और कीर्तनसे
(भक्ति-साधन सम्पन्न होता है)।
मनसे तो नित्य भगवान्का चिन्तन करना ही चाहिये, परन्तु
कान और वाणीसे भी सदा-सर्वदा लोगोंके बीचमें भी भगवान्का
गुण ही सुनना और कहना चाहिये। मनसे भगवत्-चिन्तनकी
चेष्टा तभी सफल होती है, जब हमारी इन्द्रियाँ भी भगवत्सम्बन्धी
कार्योंमें ही लगी रहें। सभी कार्योंका प्रायः आधार होता है सुनना
और बोलना। यदि कानोंमें सदा विषयोंकी चर्चा आती रहेगी
और वाणीसे सदा विषयोंकी बातें की जायँगी तो मनसे
भगवान्का चिन्तन होना असम्भव-सा ही समझना चाहिये। परन्तु
यदि कान और जबान भगवान्में लगे रहेंगे—उन्हें दूसरे कार्यके
लिये फुरसत ही नहीं मिलेगी, तो अन्यान्य इन्द्रियाँ और मन भी