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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 69 of 178

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Page 69

प्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६७
तदेव सत्यं तदुहैव मंगलं
तदेव पुण्यं भगवद्गुणोदयम् ॥
तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवं
तदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम्।
तदेव शोकार्णवशोषणं नृणां
यदुत्तमश्लोकयशोऽनुगीयते ॥
(१२।१२।४८-४९)
'जिस वाणीसे अधोक्षजभगवान्‌की कथा न कही जाकर
विषयोंकी बुरी बातें कही जाती हैं, वह वाणी असत् और व्यर्थ
है। जिन वचनोंमें भगवान्‌के गुणोंको प्रकट किया जाता है,
पुण्यकीर्ति भगवान्‌का यश वर्णन किया जाता है, वास्तवमें वही
वचन सत्य हैं, वही मंगलरूप हैं, वही पुण्य हैं, वही मनोहर हैं,
वही रुचिर हैं, वही नित्य नये-नये रसमय हैं, वही सदा मनको
महान् आनन्द देनेवाले हैं और वही मनुष्योंके शोकरूपी समुद्रको
सुखानेवाले हैं।'
अतएव कानोंसे भगवान्‌के गुण और नामोंका श्रवण और
वाणीसे उनका कीर्तन करना चाहिये। इसीसे भगवान्‌का निर्मल
प्रेम उदय होता है।
श्रीमद्भागवतमें कहा गया है—
ता ये शृण्वन्ति गायन्ति ह्यनुमोदन्ति चादृताः।
मत्पराः श्रद्दधानाश्च भक्तिं विन्दन्ति ते मयि॥
(११।२६।२९)
य एतद्देवदेवस्य विष्णोः कर्माणि जन्म च।
कीर्तयेच्छ्रद्धया मर्त्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार-
वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि।