प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 64 of 178
Read in context६२ प्रेम-दर्शन
विषयोंका त्याग करना चाहिये। वास्तवमें इस सूत्रमें विषयत्यागमें
उन्हीं विषयोंका त्याग समझना चाहिये जो हमारे मनको
भगवान्से हटाकर भोगोंमें—जगत्-प्रपंचमें लगा देते हैं। ध्यान,
चिन्तन, कीर्तन, भगवत्सेवा, साधुसत्कार, सत्संग आदि जो
भगवदनुकूल विषय हैं, उनमें तो तन-मनको चाह करके लगाना
चाहिये और जिन विषयोंके संग्रह और सेवनकी शरीरयात्रा या
कुटुम्बपोषणके लिये नितान्त आवश्यकता हो, उनका भी
यथासम्भव बहुत ही थोड़े परिमाणमें संग्रह और सेवन करना
चाहिये और वह भी शास्त्रानुकूल तथा ईश्वरकी आज्ञा समझकर
अन्य किसी भी फल-कामनाको मनमें स्थान न देते हुए केवल
ईश्वर-प्रीत्यर्थ ही। इस प्रकारसे किया हुआ विषय-सेवन भी
विषयत्यागके ही तुल्य समझा जाता है। केवल बाहरसे किसी
विषयका त्याग कर दिया जाय और मनमें उसका स्मरण बना
रहे, तो वह यथार्थ त्याग नहीं है; इसीलिये सूत्रमें विषयत्यागके
साथ-ही-साथ आसक्तित्यागकी भी आवश्यकता बतलायी गयी
है। महाभारतमें कहा है—
त्यागः स्नेहस्य यत्त्यागो विषयाणां तथैव च।
(शान्तिपर्व १९२। १७)
'विषयासक्ति और विषय दोनोंके त्यागका नाम ही त्याग है।'
इसीसे विषयानुरागका त्याग होगा और विषयानुरागसे रहित हृदय
ही भगवत्प्रेमका दिव्य धाम बन सकता है। भगवत्प्रेमकी प्राप्ति
होनेपर तो विषयका त्याग स्वाभाविक ही रहता है। श्रीरामचरितमानसमें
कहा है—
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥
अमृतके स्वादको चख लेने और उसके गुणसे लाभ उठा
लेनेपर फिर विषकी ओर किसीकी नजर ही क्यों जाने लगी!