प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६१
वस्तु रह ही नहीं जाती; जब भोक्ता ही कोई नहीं रहता, तब भोग्य
वस्तु कहाँसे रहे? वहाँ तो एकमात्र प्राणाधार भगवान् ही सर्वभोक्ता
हैं और हम अपने समस्त अंगों एवं समस्त सामग्रियोंसहित भगवान्के
भोग्य हैं। एकमात्र वे ही पुरुष हैं और सब उनकी भोग्या प्रकृति हैं।
ऐसी अवस्थामें भक्तका अपना कोई भोग्य विषय रह ही नहीं जाता।
इसको यदि ऊँची स्थिति कहकर कोई इससे बचना चाहे तो उसे भी
साधनकालमें विषयोंका और विषयासक्तिका यथासाध्य उत्तरोत्तर
त्याग करना ही पड़ता है। शरीर विषयभोगमें लगा होगा और मन
विषयोंमें आसक्त रहेगा, तो फिर प्रियतम भगवान्की सेवा किस
तन-मनसे होगी? अतएव विषय-त्यागकी बड़ी भारी आवश्यकता
है। बाह्य भोग तो क्या, मनसे भी विषयोंका चिन्तन छोड़ना पड़ेगा;
क्योंकि यह नियम है कि मन जिस वस्तुका चिन्तन करेगा, उसीमें
उसकी आसक्ति होगी। भगवान्ने श्रीमद्भागवतमें कहा है—
विषयान् ध्यायताश्चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश्चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥
अर्थात् 'विषयोंका चिन्तन करनेसे मन विषयोंमें आसक्त
होता है और मेरा बार-बार स्मरण करनेसे वह मुझमें लीन हो
जाता है।'
मनको जहाँ लगाओ वहीं लग जाता है और वह लगाना
होता है इन्द्रियोंके द्वारा ही; हम बार-बार जिस प्रकारके दृश्योंको
देखेंगे, जैसी बात सुनेंगे, जैसी चीज खायेंगे, जो कुछ सूँघेंगे, जैसी
वस्तुका स्पर्श करेंगे, उन्हींका मनमें बार-बार चिन्तन होगा और
जिस वस्तुका अधिक चिन्तन होगा, उसीमें आसक्ति होगी।
नाटक देखेंगे, वेश्याका गाना सुनेंगे, उनमें आसक्ति होगी; भक्त-
लीला देखेंगे, कीर्तन सुनेंगे तो उनमें आसक्ति होगी। अतएव
भक्तिकी अभिलाषा रखनेवालोंको भगवान्के प्रतिकूल तमाम