प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिके साधन और सत्संगकी महिमा ६३
परन्तु उस अमृतकी प्राप्तिके लिये भी—उसकी ओर गति होनेके
लिये भी विषयविषके त्यागकी आवश्यकता है। विषयासक्तिका
त्याग करके भगवान्में आसक्त होनेमें ही परम सुख है। भगवान्
कहते हैं—
मय्यर्पितात्मनः सभ्य निरपेक्षस्य सर्वतः।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत्कुतः स्याद्विषयात्मनाम्॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१२)
‘मुझमें चित्त लगानेवाले और समस्त विषयोंकी अपेक्षा
छोड़नेवाले भक्तको आत्मस्वरूप मुझसे जो परम सुख मिलता है,
वह सुख विषयासक्तचित्त लोगोंको कहाँसे मिल सकता है?’
अव्यावृत्तभजनात् ॥ ३६ ॥
३६–अखण्ड भजनसे (भक्तिका साधन सम्पन्न होता है)।
भजन भक्तिका प्रधान अंग है, यह साध्य और साधन दोनों है।
जो भगवत्प्रेमको प्राप्त कर चुके हैं, उनके लिये अखण्ड भजन
स्वाभाविक हो जाता है और जिनको भगवत्प्रेमकी प्राप्ति करनी है
उनको अखण्ड भजनका अभ्यास करना चाहिये। जो मनुष्य भजन
बिना मुक्ति और भगवत्प्रेमकी प्राप्ति चाहता है वह भूलता है। गोसाईं
श्रीतुलसीदासजी महाराज कहते हैं—
बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥
‘जलके मन्थनसे चाहे घी निकल आवे, बालूसे चाहे तेल निकले;
परन्तु भगवान्के भजन बिना भवसागरसे मनुष्य नहीं तर सकता, यह
सिद्धान्त अकाट्य है।’ अतएव भजन तो अनिवार्य साधन है। फिर
भक्तिके साधकके लिये तो यही एक खास वस्तु है। विषयसे मन
हटाकर यदि भगवान्में न लगाया जाय तो वह वापस दौड़कर वहीं
चला जायगा। विषयत्याग वैराग्य है और भगवत्-भजन अभ्यास।