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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 41 of 178

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प्रेमरूपा भक्तिके लक्षण और उदाहरण ३९
श्रीभगवान्‌की दिव्य लीला, महिमा, उनके गुण और नामोंके
कीर्तन तथा श्रवणमें मन लगाना निस्सन्देह भक्तिका प्रधान लक्षण है।
संसारमें अधिकांश मनुष्य तो ऐसे हैं जिन्हें भगवान् और भगवान्‌की
कथासे कोई मतलब ही नहीं है। दिन-रात विषय-चर्चामें ही उनका
जीवन बीतता है। न तो वे कभी भगवान्‌का गुणगान करते हैं और
न उन्हें भगवच्चर्चा सुहाती है। ‘श्रवण न रामकथा अनुरागी।’ इस
अवस्थामें जिन मनुष्योंका मन भगवान्‌के गुणानुवाद सुनने और
कहनेमें लगा रहता है वे अवश्य ही भक्त हैं। सूत्रकार आचार्य
श्रीनारदजीने स्वयं महर्षि वेदव्याससे कहा है—
इदं हि पुंसस्तपसः श्रुतस्य वा
स्विष्टस्य सूक्तस्य च बुद्धिदत्तयोः।
अविच्युतोऽर्थः कविभिर्निरूपितो
यदुत्तमश्लोकगुणानुवर्णनम् ॥
(श्रीमद्भा० १।५।२२)
‘विद्वानोंने यही निरूपित किया है कि भगवान्‌का गुणानुवाद-
कीर्तन ही तप, वेदाध्ययन, भलीभाँति किये हुए यज्ञ, मन्त्र, ज्ञान
और दान आदि सबका अविनाशी फल है।’ श्रीरामचरितमानसमें
कहा है—
रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥
भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा॥
अतएव श्रीहरिकथामें यथार्थ अनुराग होना भक्ति है और इस
भक्तिसे भगवान्‌की प्राप्ति निश्चय ही हो जाती है।
आत्मरत्यविरोधेनेति शाण्डिल्यः ॥ १८ ॥
१८-शाण्डिल्य ऋषिके मतमें आत्मरतिके अविरोधी विषयमें
अनुराग होना ही भक्ति है।
अविच्छिन्नरूपसे शुद्ध आत्मस्वरूपमें रत रहना ही आत्मरति