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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

Page 38 of 178

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३६ प्रेम-दर्शन
प्रेमकी बाह्यज्ञानशून्य, विधि-निषेधसे अतीत सिद्धावस्थामें
लौकिक और वैदिक कर्मोंका त्याग अपने-आप ही हो जाता है,
जान-बूझकर किया नहीं जाता।
इसलिये जबतक प्रेमकी वैसी, सब कुछ भुला देनेवाली स्थिति प्राप्त
न हो जाय तबतक प्रेमके नामपर शास्त्रविहित कर्मोंका त्याग कभी
नहीं करना चाहिये। शास्त्रके अनुसार भगवान्‌के अर्पणबुद्धिसे भगवदनुकूल
नित्य-नैमित्तिक कर्म और श्रवण-कीर्तनादिरूप भजन करते-करते ही
भगवान्‌का वह परमोच्च प्रेम प्राप्त होता है। भगवान् स्वयं आज्ञा करते हैं—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
(गीता १६। २४)
अतः तुम्हारे लिये क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना
चाहिये—इसकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है, यह जानकर तुम्हें
शास्त्रविधिके अनुसार ही कर्म करना चाहिये।
अन्यथा पातित्याशंकया ॥ १३ ॥
१३-नहीं तो गिर जानेकी सम्भावना है।
जो मनुष्य जान-बूझकर शास्त्रोंकी आज्ञाका पालन न करके
शास्त्रके प्रतिकूल, अमर्यादित कार्य करता है और उसे प्रेमका
नाम देकर दोषमुक्त होना चाहता है, वह अवश्य ही गिर जाता
है। भगवान्‌ने स्वयं कहा है—
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
(गीता १६। २३)
'जो मनुष्य शास्त्रकी विधिको छोड़कर मनमाना स्वेच्छाचार
करता है वह न सिद्धि पाता है, न परम गति पाता है और न उसे
सुखकी ही प्राप्ति होती है।' जान-बूझकर शास्त्रविहित कर्मोंका