प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
Page 39 of 178
Read in contextप्रेममें अनन्यता
३७
त्याग करना प्रेमका आदर्श नहीं है, मोह है, उच्छृंखलता और स्वेच्छाचार
है। ऐसा करनेवाला परिणाममें आसुरी योनि, नरक और दुःखोंको
ही प्राप्त होता है।
लोकोऽपि तावदेव किन्तु भोजनादिव्यापारस्त्वाशरीर-
धारणावधि ॥ १४॥
१४-लौकिक कर्मोंको भी तबतक (बाह्यज्ञान रहनेतक
विधिपूर्वक करना चाहिये।) पर भोजनादि कार्य जबतक
शरीर रहेगा तबतक होते रहेंगे।
वैदिक कर्मके साथ ही लौकिक जीविका, गृहस्थ-पालन आदिके
कार्य भी सावधानीके साथ भगवदनुकूल विधिके अनुसार करने
चाहिये। अवश्य ही एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें वैदिक, लौकिक
कार्य अनायास ही छूट जाते हैं; परंतु उस स्थितिके प्राप्त होनेतक
दोनों प्रकारके कर्म विधिवत् अवश्य करने चाहिये। फिर तो आप
ही छूट जायँगे। परन्तु आहारादि कर्म उस अवस्थामें भी रहेंगे।
कारण, वे शरीरके लिये आवश्यक हैं। यद्यपि प्रेमके नशेमें चूर भक्त
आहारादिके लिये न तो कोई इच्छा करता है और न चेष्टा ही करता
है, परन्तु आहारादि प्राप्त होनेपर अभ्यासवश अनायास ही उसके
द्वारा आहार कर लिया जाता है। अवश्य ही वह भी भगवत्प्रसाद ही
होता है।
🔲 🔲