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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

Page 37 of 178

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प्रेममें अनन्यता ३५
जाके प्रिय न राम-बैदेही।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनितन्हि, भये मुद-मंगलकारी॥
प्रह्लादने भगवान्‌के प्रतिकूल पिताकी आज्ञा नहीं मानी,
विभीषणने भाईका साथ छोड़ दिया, भरतजी माताकी आज्ञाको
टाल गये, राजा बलिने गुरु शुक्राचार्यकी बात नहीं सुनी और
ब्रजवनिताओेने पतियोंकी आज्ञापर ध्यान नहीं दिया और ये सभी
जगत्‌के लिये कल्याणकारी हुए।
कर्म चार प्रकारके होते हैं—नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निषिद्ध।
इनमें मद्य-मांस-सेवन, चोरी, व्यभिचार आदि निषिद्ध कर्म तो
सभीके लिये त्याज्य हैं। शास्त्रीय काम्य (सकाम) कर्म बन्धनकारक
तथा जन्म-मृत्युके चक्रमें डालनेवाले होनेके कारण ‘काम्यानां कर्मणां
न्यासम्’ इस भगवत्-वचनानुसार त्याज्य हैं। रहे नित्य और नैमित्तिक
कर्म, इनको लौकिक और वैदिक विधिके अनुसार फलासक्ति
छोड़कर केवल भगवान्‌के आज्ञानुसार भगवत्-प्रीत्यर्थ करना चाहिये।
भगवत्-प्रीत्यर्थ वही कर्म होते हैं जो भगवान्‌के प्रति प्रेम बढ़ानेवाले
हों। गीताके अनुसार आसक्ति और फलाशा छोड़कर मन, वाणी
और शरीरसे भगवान्‌के अनुकूल कर्म करना और प्रतिकूल कर्मोंका
त्याग करना ही विरोधी कर्मोंमें उदासीनता है। प्रेमाभक्तिकी उन्मादमयी
स्थिति प्राप्त न होनेतक ऐसे भगवदनुकूल कर्म प्रेमी भक्तके द्वारा
स्वाभाविक हुआ ही करते हैं।
भवतु निश्चयदाढ्‌र्यादूर्ध्वं शास्त्ररक्षणम्॥ १२॥
१२- (विधिनिषेधसे अतीत अलौकिक प्रेमप्राप्ति करनेका
मनमें) दृढ़ निश्चय हो जानेके बाद भी शास्त्रकी रक्षा करनी
चाहिये। अर्थात् भगवदनुकूल शास्त्रोक्त कर्म करने चाहिये।