प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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कबहुँक हृदै उमंग बहुत ऊँचे सुर गावै।
कबहुँक है मुख मौन गगन जैसो रहि जावै॥
चित्त बित्त हरिसों लग्यो सावधान कैसे रहै।
यह प्रेमलच्छना भक्ति है, शिष्य सुनो 'सुन्दर' कहै॥
तस्मिन्ननन्यता तद्विरोधिषूदासीनता च ॥ ९ ॥
९-उस प्रियतम भगवान्में अनन्यता और उसके प्रतिकूल
विषयमें उदासीनताको भी निरोध कहते हैं।
बाहरी ज्ञान बना रहनेकी स्थितिमें भी प्रेमी भक्त अपने प्रियतमके
प्रति अनन्य भाव रखता हुआ उसके प्रतिकूल कार्योंसे सर्वथा उदासीन
रहता है। इस प्रकार सावधानीसे होनेवाले कर्म भी निरोध कहलाते
हैं। प्रेमी भक्तके द्वारा होनेवाली प्रत्येक चेष्टा अपने प्रियतमके अनुकूल
होती है और अनन्य भावसे उसीकी सेवाके लिये होती है। प्रतिकूल
चेष्टा तो उसके द्वारा वैसे ही नहीं होती जैसे सूर्यके द्वारा कहीं अँधेरा
नहीं होता या अमृतके द्वारा मृत्यु नहीं हो सकती।
अन्याश्रयाणां त्यागोऽनन्यता ॥ १० ॥
१०-(अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर) दूसरे आश्रयोंके
त्यागका नाम अनन्यता है।
प्रेमी भक्तके मनमें अपने प्रियतम भगवान्के सिवा अन्य
किसीके होनेकी ही कल्पना नहीं होती, तब वह दूसरेका भजन
कैसे करे? वह तो चराचर विश्वको अपने प्रियतमका शरीर
जानता है, उसे कहीं दूसरा दीखता ही नहीं—
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥
रहीम कहते हैं कि आँखोंमें प्यारेकी मधुर छबि ऐसी समा
रही है कि दूसरी किसी छबिके लिये स्थान ही नहीं रह गया—
प्रीतम-छबि नैनन बसी, पर छबि कहाँ समाय।
भरी सराय 'रहीम' लखि, आप पथिक फिरि जाय॥