प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेममें अनन्यता ३३
गोपियोंकी सर्वत्र श्याममयी चित्तवृत्तिका वर्णन करते हुए
श्रीदेवकविने कहा है—
औचक अगाध सिंधु स्याहीकौ उमड़ि आयो,
तामें तीनों लोक बूडि गए एक संगमें।
कारे-कारे आखर लिखे जु कारे कागद सु
न्यारे करि बाँचै कौन जाँचै चितभंगमें॥
आँखिनमें तिमिर अमावसकी रैन जिमि,
जंबूनद-बुंद जमुना-जल-तरंगमें।
यों ही मन मेरो मेरे कामकौ न रह्यो माई,
स्याम रंग ह्वै करि समानो स्याम रंगमें॥
यदि कोई उससे दूसरेकी बात कहता है तो वह उसे सुनना ही
नहीं चाहता या उसे सुनायी ही नहीं पड़ती। यदि कहीं जबरदस्ती
सुननी पड़ती भी है तो उसका मन उधर आकर्षित होता ही नहीं।
शिवजीकी अनन्योपासिका पार्वतीजीको सप्तर्षियोंने महादेवजीके अनेक
दोष बतलाकर उनसे मन हटाने और सर्वसद्गुणसम्पन्न भगवान् विष्णुमें
मन लगानेको कहा, तब शिवप्रेमकी मूर्ति भगवतीने उत्तर दिया—
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥
इसी तरह गोपियोंने भी उद्धवजीसे कहा था—
ऊधौ! मन मानेकी बात।
दाख छोहारा छोड़ि अमृतफल बिषकीरा बिष खात॥
जो चकोरको दै कपूर कोउ तजि अंगार अघात।
मधुप करत घर कोरे काठमें बँधत कमलके पात॥
ज्यों पतंग हित जानि आपनो, दीपकसों लपटात।
'सूरदास' जाको मन जासों, ताको सोइ सुहात॥