प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेममें अनन्यता ३१
प्रेमा-भक्तिमें यह कर्मत्याग अपने-आप ही हो जाता है। प्रेममें
मतवाला भक्त अपने प्रियतम भगवान्को छोड़कर अन्य किसी
बातको जानता नहीं; उसका मन सदा श्रीकृष्णाकार बना रहता
है, उसकी आँखोंके सामने सदा सर्वत्र प्रियतम भगवान्की छबि
ही रहती है। दूसरी वस्तुमें उसका मन ही नहीं जाता। श्रीगोपियोंने
भगवान्से कहा था—
चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु
यन्निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये।
पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्
यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥
(श्रीमद्भा० १०।२९।३४)
‘हे प्रियतम! हमारा चित्त आनन्दसे घरके कामोंमें आसक्त हो
रहा था, उसे तुमने चुरा लिया। हमारे हाथ घरके कामोंमें लगे
थे, वे भी चेष्टाहीन हो गये और हमारे पैर भी तुम्हारे पाद-
पद्मोंको छोड़कर एक पग भी हटना नहीं चाहते। अब हम घर
कैसे जायँ और जाकर करें भी क्या?’
जगत्का चित्र चित्तसे मिट जानेके कारण वह भक्त किसी भी
लौकिक (स्मार्त) अथवा वैदिक (श्रौत) कार्यके करने लायक
नहीं रह जाता। इससे वे सब स्वयमेव छूट जाते हैं। सुन्दरदासजी
ऐसे प्रेमी भक्तकी दशाका वर्णन करते हुए कहते हैं—
न लाज तीन लोककी, न वेदको कह्यौ करै।
न संक भूत-प्रेतकी, न देव-जच्छते डरै॥
सुनै न कान और की, द्रसै न और इच्छना।
कहै न बात और की, सुभक्ति प्रेमलच्छना॥
कबहुँक हँसि उठि नृत्य करै रोवन फिर लागे।
कबहुँक गदगद कंठ सबद निकसें नहिं आगे॥