प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in context२८ प्रेम-दर्शन
'जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता
है, न कामना करता है तथा जो शुभ, अशुभ सबका त्यागी है,
वह भक्तिमान् पुरुष मुझको प्रिय है।'
यज्ज्ञात्वा मत्तो भवति स्तब्धो भवति आत्मारामो भवति ॥ ६ ॥
६-जिसको (परम प्रेमरूपा भक्तिको) जान (प्राप्त) कर
मनुष्य उन्मत्त हो जाता है, स्तब्ध (शान्त) हो जाता है, (और)
आत्माराम बन जाता है।
भगवत्प्रेम प्रकट होते ही मनुष्यको पागल कर देता है; अतः
प्रेमी भक्त सदा प्रेमके नशेमें चूर हुआ दिन-रात प्रभुके ही गुण
गाता, सुनता और चिन्तन करता रहता है। बाहरकी दूसरी
बातोंका उसे होश ही नहीं रहता। जैसे पागल मनमानी बकता
और करता है, इसी प्रकार वह प्रेमोन्मत्त भी प्रभुकी चर्चामें ही
तल्लीन रहता है; क्योंकि उसके मनको यही अच्छा लगता है।
भागवतमें कहा है—
शृण्वन् सुभद्राणि रथांगपाणे-
र्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके।
गीतानि नामानि तदर्थकानि
गायन् विलज्जो विचरेदसंगः ॥
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति गाय-
त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥
(११।२।३९-४०)
'भक्त चक्रपाणिभगवान्के कल्याणकारक एवं लोकप्रसिद्ध
जन्मों और कर्मोंको सुनता हुआ, उनके अनुसार रखे गये नामोंको