प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २९
लज्जा छोड़कर गान करता हुआ संसारमें अनासक्त होकर
विचरता है। इस प्रकारका व्रत धारणकर वह अपने प्रियतम
प्रभुके नाम-संकीर्तनमें प्रेम हो जानेके कारण द्रवितचित्त हुआ
उन्मत्तके समान कभी अलौकिक भावसे खिलखिलाकर हँसता है,
कभी रोता है, कभी चिल्लाता है, कभी ऊँचे स्वरसे गाने लगता
है और कभी नाच उठता है।'
यों उन्मत्तकी तरह आचरण करता हुआ प्रेमी आनन्दमें भरकर
कभी चुप हो जाता है, शान्त होकर बैठ जाता है। यह स्तब्धता
उसकी पूर्णकामताका परिचय देती है। प्रभुकी मूर्ति हृदयमें प्रकट
हो गयी, रूपमाधुरीमें आनन्दमत्त होकर भक्त ध्यानमग्न हो गया।
सुतीक्ष्णकी दशा बताते हुए गोसाईंजी कहते हैं—
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा॥
नृत्य करते-करते प्रभुमय बन जानेपर ऐसी ही अवस्था हुआ
करती है। उसका चित्त और शरीर सर्वथा स्तब्ध—शान्त हो जाता
है। आत्मा आनन्दमय बन जाता है। इसीको आत्माराम कहते हैं।
इस आत्मारामस्थितिमें विषयतृष्णा तो कहीं रह ही नहीं जाती—
नहि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥
अन्य किसीका भी ज्ञान नहीं रहता। यही प्रेमाद्वैत या रसाद्वैत
है। प्रियतमके साथ मिलकर प्रेमीका पृथक् अस्तित्व ही लोप हो
जाता है।