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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

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प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २७
स्याम गति स्याम मति स्याम ही है प्रानपति,
स्याम सुखदाई सों भलाई सोभाधाम है॥
ऊधौ तुम भए बौरे पाती लैके आए दौरे,
जोग कहाँ राखैं यहाँ रोम-रोम स्याम है॥
जब एक प्रियतम श्रीकृष्णको छोड़कर दूसरेका मनमें प्रवेश
ही निषिद्ध है तब दूसरे किसीकी प्राप्तिके लिये उत्साह तो हो
ही कैसे ? कोई किसीको देखे, सुने, उसके लिये मनमें इच्छा
उत्पन्न हो, तब न उसके लिये प्रयत्न किया जाय ? मन किसीमें
रमे, तब न उसे पानेके लिये उत्साह हो। मन तो पहलेसे ही
किसी एकका हो गया; उसने मनपर अपना पूरा अधिकार जमा
लिया और स्वयं उसमें आकर सदाके लिये बस गया। दूसरे
किसीके लिये कोई गुंजाइश ही नहीं रह गयी; यदि कोई आता
भी है तो उसे दूरसे ही लौट जाना पड़ता है! क्या करे, जगह
ही नहीं रही।
रोम रोम हरि रमि रहे, रही न तनिकौ ठौर।
नेत्र बेचारे मनकी अनुमति बिना किसको देखें ? जब कोई
कहीं दीखता ही नहीं, तब उसको पानेके लिये उत्साहकी बात ही
नहीं रह जाती।
दूसरी बात यह है कि उत्साह होता है मनुष्यको किसी सुखकी
इच्छासे। जब समस्त सुखोंका खजाना ही अपने पास है तब क्षुद्र
सुखके लिये उत्साह कैसे हो ? इसलिये प्रेमोत्साहके पुतले
भगवत्प्रेमी पुरुषोंमें लौकिक कार्योंके प्रति—विषयोंके प्रति कोई भी
उत्साह नहीं देखा जाता।
भगवान्ने स्वयं कहा है—
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥
(श्रीमद्भगवद्गीता १२।१७)