प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in context२६ प्रेम-दर्शन
चहौं न सुगति सुमति संपति कछु रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई।
हेतुरहित अनुरागु रामपद बढ़ु अनुदिन अधिकाई॥
इसी प्रकार वह किसी जीवसे या लौकिक दृष्टिसे प्रतिकूल
माने जानेवाले पदार्थ या स्थितिसे कभी द्वेष नहीं करता। वह सब
जीवोंमें अपने प्रभुको और सब पदार्थों और स्थितिमें प्रभुकी
लीलाको देख-देखकर क्षण-क्षणमें आनन्दित होता है।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
भक्तका मन सदा प्रभु-प्रेममें ऐसा तल्लीन हो जाता है कि
आधे क्षणभरके लिये भी अन्य किसी पदार्थमें नहीं रमता।
गोपियाँ उद्धवजीसे कहती हैं—
ऊधौ, मन न भए दस बीस।
एक हुतो सो गयो स्याम सँग, को आराधै ईस॥
मन अपने पास रहता ही नहीं, तब वह दूसरेमें कैसे रमे?
इसीलिये तो प्रेमियोंके भगवान्का नाम ‘मनचोर’ है—
मधुकर स्याम हमारे चोर।
मन हर लियो माधुरी मूरति, निरख नयनकी कोर॥
वे प्रेमी भक्तके चित्तको ऐसी चतुरीसे चुराकर अपनी
सम्पत्ति बना लेते हैं कि उसपर दूसरेकी कभी नजर भी नहीं
पड़ सकती। दूसरा कोई दीखे तब न कहीं उसमें आसक्ति या
प्रीति हो, परन्तु जहाँ मनमें दूसरेकी कल्पनातकको स्थान नहीं
मिलता, वहाँ किसमें कैसे आसक्ति या रति हो। प्रेममयी
गोपियोंने कहा है—
स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन,
आठों जाम ऊधौ हमें स्याम ही सों काम है॥
स्याम हिये स्याम जिये स्याम बिनु नाहिं तिये,
आँधेकी-सी लाकरी अधार स्याम नाम है॥