प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २५
वह प्रेमी भक्त उस परम महान् वस्तुको पा लेता है, जिसके
पानेपर सारी इच्छाएँ नष्ट हो जाती हैं। जगत्के प्रेम, ऐश्वर्य,
सौन्दर्य, बल, यश, ज्ञान, वैराग्य आदि समस्त पदार्थ, जिनके
लिये भोगी और त्यागी सभी मनुष्य अपनी-अपनी रुचिके अनुसार
सदा ललचाते रहते हैं, भगवत्प्रेमरूपी दुर्लभ पदार्थके सामने
अत्यन्त तुच्छ हैं। विश्वभरमें फैले हुए उपर्युक्त समस्त पदार्थोंको
एक स्थानपर एकत्रित किया जाय तो भी वे सब मिलकर जिस
भगवान्रूपी समुद्रके एक जलकणके समान ही होते हैं, वे
भगवान् स्वयं जिस प्रेमके आकर्षणसे सदा खिंचे रहते हैं, उस
प्रेमके सामने संसारके पदार्थ किस गिनतीमें हैं?
श्रीशुकदेव मुनि कहते हैं—
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ निःश्रेयसेश्वरे।
विक्रीडतोऽमृताम्भोधौ किं क्षुद्रैः खातकोदकैः॥
(श्रीमद्भा० ६।१२।२२)
'जो परम कल्याणके स्वामी भगवान् श्रीहरिकी भक्ति करता
है वह अमृतके समुद्रमें क्रीड़ा करता है। गढैयामें भरे हुए मामूली
गन्दे जलके सदृश किसी भी भोगमें या स्वर्गादिमें उसका मन
चलायमान नहीं होता।'
प्रेमामृतसमुद्रमें डूबा हुआ भक्त क्यों अन्य पदार्थोंकी इच्छा
करने लगा?
जैसे भक्त भोग, मोक्ष आदिकी इच्छा नहीं करता; वैसे ही इनके
नष्ट हो जानेका शोक भी नहीं करता। भोगोंके नाशको वह परमात्माकी
लीला समझता है, इससे सदा—हर हालतमें आनन्दमें ही रहता है।
परन्तु भगवत्प्रेमके सेवनमें यदि सायुज्य मोक्षके साधनमें कमी आती है तो
वह उसके लिये भी शोक नहीं करता; वरं सदा यही चाहता है कि मेरा
भगवत्प्रेम बढ़ता रहे, चाहे जन्म कितने ही क्यों न धारण करने पड़ें।