प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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'मुक्ति आदि सिद्धियाँ और अनेक प्रकारकी विलक्षण भुक्तियाँ
(भोग) दासीकी भाँति हरिभक्ति महादेवीकी सेवामें लगी रहती हैं।'
काकभुशुण्डिजी महाराज कहते हैं—
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई॥
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई॥
इसलिये यहाँ सिद्धिका अर्थ 'कृतकृत्यता' लेना चाहिये। भक्तको
किसी वस्तुके अभावका बोध नहीं रहता। वह प्रियतम भगवान्के
प्रेमको पाकर सर्वथा पूर्णकाम हो जाता है। यह पूर्णकामता ही उसका
अमर होना है। जबतक मनुष्य कृतकृत्य या पूर्णकाम नहीं होता,
तबतक उसे बारम्बार कर्मवश आना-जाना पड़ता है। पूर्णकाम भक्त
सृष्टि और संहार दोनोंमें भगवान्की लीलाका प्रत्यक्ष अनुभव कर
मृत्युको खेल समझता है। वास्तवमें उसके लिये मृत्युकी ही मृत्यु हो
जाती है। प्रभु-लीलाके सिवा मृत्युसंज्ञक कोई भयावनी वस्तु उसके
ज्ञानमें रह ही नहीं जाती और इसलिये वह तृप्त हो जाता है। जबतक
जगत्के पदार्थोंकी ईश्वर-लीलासे अलग कोई सत्ता रहती है तभीतक
उनको सुखद या दुःखप्रद समझकर मनुष्य निरन्तर नये-नये सुखप्रद
पदार्थोंकी इच्छा करता हुआ अतृप्त रहता है। जब सबका मूल स्रोत,
सबका यथार्थ पूर्ण स्वरूप उसे मिल जाता है तब उन खण्ड और
अपूर्ण पदार्थोंकी ओर उसका मन ही नहीं जाता। वह पूर्णको पाकर
तृप्त हो जाता है।
यत्प्राप्य न किंचिद्वाञ्छति न शोचति न द्वेष्टि न रमते
नोत्साही भवति ॥ ५ ॥
५-जिसके (प्रेमस्वरूपा भक्तिके) प्राप्त होनेपर मनुष्य न
किसी भी वस्तुकी इच्छा करता है, न शोक करता है, न द्वेष
करता है, न किसी वस्तुमें आसक्त होता है और न उसे
(विषयभोगोंकी प्राप्तिमें) उत्साह होता है।