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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

DevanagariHindipublished178 pages

Page 25 of 178

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Page 25

प्रेमरूपा भक्तिका स्वरूप २३
न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
मय्यर्पितात्मेच्छति मद्बिनान्यत् ॥
(श्रीमद्भा० ११।१४।१४)
'मुझमें चित्त लगाये रखनेवाले मेरे प्रेमी भक्त मुझको छोड़कर
ब्रह्माका पद, इन्द्रासन, चक्रवर्ती राज्य, लोकान्तरोंका आधिपत्य,
योगकी सब सिद्धियाँ और सायुज्य मोक्ष आदि कुछ भी नहीं चाहते।'
एक भक्त कहते हैं—
रोमांचेन चमत्कृता तनुरियं भक्त्या मनो नन्दितं
प्रेमाश्रूणि विभूषयन्ति वदनं कण्ठं गिरो गद्गदाः।
नास्माकं क्षणमात्रमप्यवसरः कृष्णार्चनं कुर्वतां
मुक्तिर्द्वारि चतुर्विधापि किमियं दास्याय लोलायते ॥
(बोधसार)
'प्रियतम श्रीकृष्णकी पूजा करते समय शरीर पुलकित हो
गया, भक्तिसे मन प्रफुल्लित हो गया। प्रेमके आँसुओंने मुखको
और गद्गद वाणीने कण्ठको सुशोभित कर दिया। अब तो हमें
एक क्षणके लिये भी फुरसत नहीं है कि हम किसी दूसरे
विषयको स्वीकार करें। इतनेपर भी सायुज्य आदि चारों
प्रकारकी मुक्तियाँ न जाने क्यों हमारे दरवाजेपर खड़ी हमारी
दासी बननेके लिये आतुर हो रही हैं।'
भक्त यदि भुक्ति और मुक्तिको स्वीकार कर ले तो वे अपना
परम सौभाग्य मानती हैं, परन्तु भक्त ऐसा नहीं करते।
हरिभक्तिमहादेव्याः सर्वा मुक्त्यादिसिद्धयः।
भुक्तयश्चाद्भुतास्तस्याश्चेटिकावदनुव्रताः ॥
(नारदपांचरात्र)