प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमी भक्तोंकी महिमा १३३
रूप, कुल, धन और क्रियादिकी प्रधानता नहीं है। ब्राह्मण
हो या शूद्र, पढ़ा-लिखा हो या बेपढ़ा-लिखा, सुन्दर हो या
कुरूप, ऊँचे कुलका हो या नीच कुलका, धनवान् हो या
दरिद्र और बहुत क्रियाशील हो या अक्रिय। जो अपना
सर्वस्व प्रभुपर न्योछावर कर सतत उनका प्रेमपूर्वक स्मरण
करनेमें अपने चित्तको तल्लीन कर देता है, उसीको भक्तिरूपी
परम दुर्लभ धन मिल जाता है। निषादका जन्म नीच जातिमें
हुआ था, सदन कसाई थे, शबरी गँवार स्त्री थी, ध्रुव अपढ़
बालक थे, विभीषण और हनुमानादि कुरूप और अकुलीन
राक्षस तथा वानर थे, विदुर और सुदामा निर्धन थे, गोपीजन
क्रियाहीन थीं, परन्तु इन सबने भक्ति और प्रपत्ति के प्रतापसे
भगवान्का प्रेम प्राप्त किया और भगवान्के परमप्रिय हो
गये। सर्व सत्कर्मोंकी फलरूपा भक्ति जिसके हृदयमें है, वही
भक्त है, वही सर्वगुणसम्पन्न है, फिर चाहे वह कोई हो, यही
बात श्रीरामचरितमानसमें कही गयी है—
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता । सोइ महि मंडित पंडित दाता ॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता । राम चरन जा कर मन राता ॥
नीति निपुन सोइ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउँ एक भगति कर नाता ॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
इसका यह तात्पर्य नहीं कि भक्त अपनेको सबसे ऊँचा
और सर्वगुणसम्पन्न समझकर सबसे अपनी पूजा कराता है
या समाज, जाति, वर्ण और आश्रममें बड़ोंके साथ खान-पान,
विवाह, व्यवहार, रहन-सहन, आचार-विचार और कुलपरम्परा