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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 134 of 178

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१३२ प्रेम-दर्शन
श्राद्ध, तर्पण आदि कर्म करने लगते हैं, जिससे देवता और
पितरोंको बड़ा सुख मिलता है। भक्तिके प्रतापसे भक्तके
आगे-पीछेके कई कुल तर जाते हैं, इसलिये अपने कुलमें
भक्तको उत्पन्न हुआ देखकर पितरगण अपनी मुक्तिकी दृढ़
आशासे हर्षोत्फुल्ल हो जाते हैं। पद्मपुराणमें कहा है—
आस्फोटयन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहाः।
मद्द्वंशे वैष्णवो जातः स नस्त्रा भविष्यति॥
'पितृ-पितामहगण अपने वंशमें भगवद्भक्तका जन्म हुआ
जानकर—यह हमारा उद्धार कर देगा, इस आशासे प्रसन्न होकर
नाचने और ताल ठोकने लगते हैं।'
मचले हुए दर्शनाकांक्षी भक्त किसी भी बातसे सन्तुष्ट
नहीं होते, अतः स्नेहमयी जननीकी भाँति उन्हें अपनी गोदमें
खिलाकर सुखी करनेके लिये सच्चिदानन्दघन भगवान् दिव्यरूपमें
साक्षात् प्रकट होते हैं। उनके प्रकट होते ही देवताओंका
अहित करनेवाले असुरोंका विनाश आरम्भ हो जाता है। इस
प्रकार भक्तके आविर्भावको ही भगवान्के प्राकट्यमें कारण
समझकर देवतागण भी नाचने लगते हैं। जबतक भगवान् या
भगवान्के प्यारे धर्मात्मा भक्तोंका आविर्भाव नहीं होता तबतक
पृथ्‍वीदेवी अनाथा रहती हैं। और जब भक्त प्रकट होते हैं
तब बछड़ेके पीछे स्नेहवश दौड़नेवाली गौकी तरह भगवान्
भी प्रकट हो जाते हैं, अतएव भक्तके आविर्भावसे ही पृथ्‍वी
सनाथा हो जाती है।
नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः ॥ ७२ ॥
७२-उनमें (भक्तोंमें) जाति, विद्या, रूप, कुल, धन और
क्रियादिका भेद नहीं है।
सूत्रकार यहाँ यह समझाते हैं कि भक्तिमें जाति, विद्या,