प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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आदिमें अपने लिये समान अधिकारका दावा करता है। भक्त
तो अभिमानका सर्वथा त्यागी है, फिर वह नया झूठा अभिमान
लादकर ऐसा क्यों करने लगा ? जो ऐसा करते हैं वे भक्त
नहीं हैं। वर्णाश्रम तथा भक्तिमें भेद है। जो भक्तिके नामपर
वर्णाश्रमकी मर्यादा नाश करना चाहते हैं, वे तो भक्तिपर लांछन
लगाते हैं। अतएव भक्तिमार्गपर चलनेवाले साधकोंको शास्त्र-
त्यागकी कभी भावना ही नहीं करनी चाहिये। यह सत्य है
कि प्रारब्धमें न होनेसे विद्या और धन नहीं मिल सकता
और न इस जन्ममें रूप, जाति तथा कुल ही बदल सकते
हैं। परन्तु इन सब वस्तुओंके होने-न-होनेसे अथवा कम-ज्यादा
होनेसे भक्तमें ऊँचा-नीचा भाव नहीं करना चाहिये—भक्तिके
नाते जातिभेद आदिके कारण भक्तको नीचा कदापि नहीं समझना
चाहिये। वैष्णवशास्त्रोंमें इसीलिये भक्तोंमें जातिभेदबुद्धिको एक
अपराध बतलाया है।*
- वैष्णवग्रन्थोंमें निम्नलिखित ६४ अपराध बतलाये गये हैं। इनपर ध्यान रखकर
चलनेसे बहुत लाभ हो सकता है। १-श्रीभगवान्को कोई देवता या तत्त्वविशेष मानना,
२-वेदोंमें ग्रन्थ या पौरुषेयबुद्धि, ३-भक्तोंमें जातिभेदबुद्धि, ४-गुरुको साधारण मनुष्य
समझना, ५-भगवान्की प्रतिमाको काठ, पत्थर, धातु, कागज या मिट्टी समझना,
६-भगवान्के प्रसादको साधारण खानेकी चीज समझना, ७-भगवान्के चरणोदकको
साधारण जल समझना, ८-तुलसीको साधारण वृक्ष समझना, ९-गौको साधारण पशु
समझना, १०-भागवत और गीताको साधारण पुस्तक समझना, ११-भगवान्की लीलाओंको
मनुष्यकी की हुई मानना, १२-सांसारिक प्रेम या स्त्रीसुखके साथ भगवान्की लीलाकी
तुलना करना, १३-गोपियोंको (भगवान्के लिये) परनारी समझना, १४-रासलीलाको
कामचेष्टा समझना, १५-भगवान्के महोत्सवके समय स्पर्शास्पर्शबुद्धि रखना,
१६-ईश्वर और शास्त्रोंको न मानकर नास्तिक हो जाना, १७-सन्देहपूर्वक धर्मका आचरण
करना, १८-धर्मके पालनमें आलस्य करना, १९-भक्तोंको बाहरी बातोंपर कसना,
२०-साधु-महात्माओंके गुण-दोषोंकी आलोचना करना, २१-अपनेको उत्तम समझना,
२२-किसी भी देवता या किसी भी शास्त्रकी निन्दा करना, २३-भगवान्की मूर्तिके सामने