Skip to content
SarvaKosh
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished178 pages

Page 133 of 178

Read in context
Page 133

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १३१
भक्त जो कुछ उपदेश करते हैं, वही सत्-शास्त्र माना जाता
है। उनका निवासस्थान ही तीर्थ, उनके कर्म ही सत्कर्म और
उनकी वाणी ही सत्-शास्त्र है। तीर्थ, सत्कर्म और शास्त्रका
रहस्य समझनेपर यह बात भलीभाँति समझमें आ जाती है।
तन्मयाः ॥ ७० ॥
७०-( क्योंकि ) वे तन्मय हैं।
जैसे नदी समुद्रमें मिलकर समुद्र बन जाती है, इसी
प्रकार भक्त भी अपना तन-मन-बुद्धि-अहंकार सब कुछ
प्रियतम भगवान्‌के समर्पण कर भगवान्‌के साथ तन्मय हो
जाता है। ऐसा भक्त साक्षात् भगवत्स्वरूप ही होता है, वह
जहाँ रहता है वहाँका तमाम सूक्ष्म और स्थूल वातावरण शुद्ध
हो जाता है। इसीलिये उसके समागममात्रसे तीर्थ, कर्म और
शास्त्र पवित्र हो जाते हैं। ऐसे ही भक्तोंके द्वारा भगवान्,
भगवन्नाम, भगवद्भक्तिकी महिमा बढ़ती है और इनके समागममें
आनेवाले पापी-से-पापी नर-नारी भी घोर संसार-सागरसे
अनायास ही तर जाते हैं।
मोदन्ते पितरो नृत्यन्ति देवताः सनाथा चेयं
भूर्भवति ॥ ७१ ॥
७१-( ऐसे भक्तोंका आविर्भाव देखकर ) पितरगण
प्रमुदित होते हैं, देवता नाचने लगते हैं और यह पृथ्वी
सनाथा हो जाती है।
भक्तोंका आविर्भाव सभीके लिये शुभ होता है, क्योंकि
उनके सभी कर्म स्वाभाविक ही लोककल्याणकारी होते हैं।
उनके प्रभावसे लोगोंमें धर्मके प्रति श्रद्धा बढ़ती है, पितृकार्य
और देवकार्योंमें विश्वास उत्पन्न हो जाता है। इससे धर्मपथसे
डिगे हुए लोग पुनः धर्ममार्गपर आरूढ़ होकर यज्ञ, दान,