Skip to content
SarvaKosh
प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished178 pages

Page 132 of 178

Read in context
Page 132

१३० प्रेम-दर्शन
शान्तस्वरूप, ब्रह्मनिष्ठ साधु-महात्मा आकर तुम्हारे प्रवाहमें स्नान
करेंगे तब उनके अंगके संगसे तुम्हारे सारे पाप धुल जायँगे;
क्योंकि उनके हृदयमें समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीहरि
निवास करते हैं।'
प्रचेतागण भगवान्‌की स्तुति करते हुए कहते हैं—
तेषां विचरतां पद्भ्यां तीर्थानां पावनेच्छया।
भीतस्य किं न रोचेत तावकानां समागमः॥
(श्रीमद्भागवत ४।३०।३७)
'आपके जो भक्तगण तीर्थोंको पवित्र करनेके लिये ही
भूमिपर विचरण करते हैं, उनका समागम संसारभयसे भीत
पुरुषको कैसे प्रिय नहीं होगा।'
धर्मराज युधिष्ठिर भक्तराज विदुरजीसे कहते हैं—
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता॥
(श्रीमद्भागवत १।१३।१०)
'हे प्रभो! आप-सरीखे भगवद्भक्त स्वयं तीर्थरूप हैं,
(पापियोंद्वारा कलुषित हुए) तीर्थोंको आपलोग अपने हृदयमें
विराजित भगवान् श्रीगदाधरके प्रभावसे पुनः तीर्थत्व प्रदान करा
देते हैं।'
इसी प्रकार जिन शास्त्रोक्त कर्मोंको भक्तगण करने लगते
हैं, वे ही सत्कर्म हो जाते हैं और वे जिस शास्त्रको आदर
देते हैं, वही सत्-शास्त्र माना जाता है। वरं यह कहना भी
अत्युक्ति नहीं कि भक्त जिस जगह रहते हैं, जिस सरोवर
या नदीमें स्नान करते हैं, वही तीर्थ बन जाता है; भक्त जो
कुछ कर्म करते हैं, वही आदर्श सत्कर्म कहलाता है और