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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 131 of 178

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Page 131

प्रेमी भक्तोंकी महिमा १२९
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥
(११।१४।२४)
‘प्रेमके प्रकट हो जानेसे जिसकी वाणी गद्गद और चित्त
द्रवीभूत हो जाता है, जो प्रेमावेशमें बार-बार रोता है, कभी हँसता
है, कभी लाज छोड़कर ऊँचे स्वरसे गाने और नाचने लगता है।
ऐसा मेरा परम भक्त त्रिलोकीको पवित्र कर देता है।’
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि
सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि ॥ ६९ ॥
६९-ऐसे भक्त तीर्थोंको सुतीर्थ, कर्मोंको सुकर्म और
शास्त्रोंको सत्-शास्त्र कर देते हैं।
तीर्थ पापी नर-नारियोंको निष्पाप और पवित्र करते हैं,
परन्तु पापात्माओंके सतत समागमसे उनमें मलिनता आ जाती
है। तीर्थोंकी वह मलिनता भक्तोंके समागमसे नष्ट होती है।
दिलीपकुमार महाराज भगीरथके घोर तपसे प्रसन्न होकर वर
देनेके लिये आविर्भूत हुई भगवती श्रीगंगाजीने उनसे कहा—
‘भगीरथ! मैं पृथ्वीपर कैसे आऊँ! संसारके सारे पापी
तो आ-आकर मुझमें अपने पापोंको धो डालेंगे। परन्तु
उन पापियोंके अपार पाप-पंकको मैं कहाँ धोने जाऊँगी,
इसपर आपने क्या विचार किया है?’ इसके उत्तरमें भगीरथने
कहा—
साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः।
हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः॥
(श्रीमद्भागवत ९।९।६)
‘हे माता! समस्त विश्वको पवित्र करनेवाले विषयोंके त्यागी,