प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)
Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar
by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)
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Read in contextप्रेमरूपा भक्ति और गौणी भक्तिका स्वरूप १०३
इस भक्तिकी अपेक्षा निम्न श्रेणीकी गौणी भक्तिका वर्णन किया
जाता है। यह गौणी भक्ति सात्त्विकी, राजसी और तामसी-भेदसे
अथवा आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी-भेदसे तीन प्रकारकी है।
जो भक्ति पापनाशके उद्देश्यसे सब कर्मफलोंको भगवान्में
समर्पण करनेके रूपमें अथवा जिसमें पूजन करना कर्तव्य है
यह समझकर भेद-दृष्टिसे पूजा की जाती है, वह सात्त्विकी है
(श्रीमद्भागवत ३।२९।१०)।
जो भक्ति विषय, यश और ऐश्वर्यकी कामनासे भेददृष्टिपूर्वक
केवल प्रतिमादिके पूजनके रूपमें ही की जाती है वह राजसी है
(श्रीमद्भागवत ३।२९।९)।
जो भक्ति क्रोधसे हिंसा, दम्भ और मत्सरताको लेकर
भेद-दृष्टिसे की जाती है वह तामसी है (श्रीमद्भागवत ३।
२९।८)।
इसी तरह आर्त, जिज्ञासु और अर्थार्थी पुरुष त्रिविध
उपासनासे तीन प्रकारकी भक्ति करते हैं; अर्थात् भक्तोंके
भावभेदसे गौणी भक्तिके तीन भेद होते हैं।
गौणी भक्तिके साधनोंसे यद्यपि साक्षात् भगवत्-प्राप्ति नहीं
होती, तथापि इस गौणी भक्तिके साधक भी सुकृती ही होते
हैं और उन्हें भी भगवत्कृपासे इसका अनुष्ठान करते-करते
अन्तमें भगवत्-प्राप्तिकी मुख्य साधनस्वरूपा या साक्षात् भगवत्-
स्वरूपा प्रेमा भक्तिकी प्राप्ति होती है। भगवान्की भक्तिमें
यही विशेषता है कि इसका अन्तिम फल दुर्लभ भगवत्प्रेमकी
प्राप्ति ही है। इसीसे गौणी भक्तिको भी श्रेष्ठ और पुण्यात्मा
पुरुषोंद्वारा ही होनेवाली माना गया है; क्योंकि भक्तिमात्रमें ही
भगवान्का भजन, भगवान्का आश्रय, भगवान्का ध्यान किसी-