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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 106 of 178

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१०४ प्रेम-दर्शन
न-किसी रूपमें रहता है और भगवद्भजन, भगवदाश्रय तथा
भगवान्‌के ध्यानका फल सीधा भगवत्प्राप्ति ही होता है।
अतएव किसी प्रकारसे भी हो, भगवान्‌की भक्ति मनुष्यको
अवश्य ही करनी चाहिये। परन्तु जहाँतक हो सके सात्त्विकी
भक्ति अथवा त्रिभुवनके वैभवको भी अनर्थ एवं भगवान्‌को
ही परम अर्थ—परम धन मानकर उसीके प्रेमकी प्राप्तिके
लिये सच्चे अर्थार्थीके भावसे भक्ति करनी चाहिये।
उत्तरस्मादुत्तरस्मात्पूर्वपूर्वा श्रेयाय भवति ॥ ५७॥
५७-(उनमें) उत्तर-उत्तर क्रमसे पूर्व-पूर्व क्रमकी भक्ति
कल्याणकारिणी होती है।
तामसीकी अपेक्षा राजसी और राजसीकी अपेक्षा सात्त्विकी
भक्ति उत्तम है। इसी प्रकार अर्थार्थी भक्तकी अपेक्षा जिज्ञासुकी
और इन दोनोंकी अपेक्षा आर्तकी भक्ति विशेष कल्याणकारिणी
होती है।