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प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

प्रेम-दर्शन: नारद भक्ति-सूत्र (देवर्षि नारद - भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार सविस्तार हिन्दी भाष्य)

Prem Darshan: Narada Bhakti Sutra with Commentary by Hanuman Prasad Poddar

by देवर्षि नारद (भाष्यकार: हनुमानप्रसाद पोद्दार)

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DevanagariHindipublished178 pages

Page 104 of 178

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Page 104

१०२ प्रेम-दर्शन
इसी सर्वव्यापी भूमानन्दके साथ अल्प सुखका तारतम्य दिखलाती
हुई श्रुति कहती है—
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ
यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पम्, यो वै भूमा
तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्।
(छान्दोग्योपनिषद् ७।२४।१)
'जहाँ दूसरेको नहीं देखता, दूसरेको नहीं सुनता, दूसरेको नहीं
जानता वही भूमा है और जहाँ दूसरेको देखता है, दूसरेको सुनता है,
दूसरेको जानता है वह अल्प है। जो भूमा है वह अमृत है और जो
अल्प है वह मरा हुआ है।' इसीलिये प्रेम सदा मधुर, अविनाशी,
सनातन और सत्य है।
गौणी त्रिधा गुणभेदादार्तादिभेदाद्वा ॥ ५६ ॥
५६-गौणी भक्ति गुणभेदसे अथवा आर्तादिभेदसे तीन
प्रकारकी होती है।
पिछले सूत्रतक उस परा या मुख्या भक्तिका विवेचन हुआ
जिसमें प्रेमी भक्त उस प्रेमाभक्तिसे अपने प्रियतम भगवान्के
प्रेममय स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीको श्रीमद्भागवतमें
अहैतुकी—निर्गुण भक्ति तथा गीतामें ज्ञानीकी भक्ति कहा है।
अहैतुकी भक्तिमें भक्तकी चित्तवृत्ति और कर्मगतिका प्रवाह
अविच्छिन्नरूपसे स्वाभाविक ही भगवान्की ओर बहता रहता है
अर्थात् उसका चित्त निरन्तर निष्काम अनन्य प्रेमभावसे भगवान्में
लगा रहता है और उसकी समस्त क्रियाएँ श्रीभगवान्के लिये ही
होती हैं (भागवत ३।२९।११-१२) और गीतोक्त दुर्लभ
तत्त्वज्ञानी महात्मा भक्त भी सब कुछ वासुदेव ही देखता है
(अध्याय ७। १७)। ये दोनों तो भगवत्स्वरूप ही हैं। अब यहाँ